रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन
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नोटों का प्रचलन की आज्ञा देना भयानक आशंका की दृष्टि से देखा जिसे गरीब लोग न तो इनकार कर सकते थे और न ही उन्हें भुना सकते थे। ख्1, इसके अतिरिक्त नोटों के भुनाने के अभाव में इतनी अधिक कठिनाई थी। विधानमंडल को यह आशंका थी कि वे भारतीय किसानों के हाथों में भगोड़ा खजाने सिद्ध होंगे। उन्हें वर्षा और दीमकों से सुरक्षित रखने में असमर्थ होने के कारण उन्हें उन नोटों से छुटकारा पाने के लिए जिन्हें उसने मजबूरी में लिया था ख्2, भारी वृद्धि की राशि अदा करनी पड़ सकती थी। कागजी मुद्रा विधेयक पेपर करेंसी बिल के उन धाराओं के प्रति मितव्ययता के आधार पर इस प्रयोजन के लिए बनाए गए थे कि धातु मुद्रा को खदेड़ दिया गया जिससे सरकार के पास इस बात का विकल्प रहे कि विधिमान्य चलार्थ नोटों किन्तु जो उच्च मूल्य के हों व कम मूल्य के नोट किन्तु विधिमान्य चलार्थ शक्ति न रखते हों इन दोनों में एक ही का चयन कर सकती थी। चूंकि सरकार ने नोटों की विधिमान्य चलार्थ का चयन किया अतः विधानमंडल ने अपनी ओर से यह जोर दिया कि उच्च मूल्य वर्ग के नोट होने चाहिए। ख्3, सर्वप्रथम विधानमंडल ने कम से कम मूल्य वर्ग के रूप में 20 रु. के नोटों को जारी करने पर बल दिया। परंतु बाद में वह इस मूल्य वर्ग को घटाकर दस रुपए के नोटों का सहमत हो गई और यह सबसे कम सीमा थी जिसे 1861 में सहन कर लिया गया था। इसके दस वर्ष बाद तक विधानमंडल ने 5 रुपए के नोटों के जारी किए जाने की अनुमति नहीं दी और यह अनुमति तभी दी गई जब सरकार ने उनके भुनाने के लिए अतिरिक्त वैध सुविधाएं देने का वचन दिया। ख्4, कुल मिलाकर भारतीय विधानमंडल की यह इच्छा रही कि भारतीय मुद्रा को अधिक मितव्ययी बनने के बजाय सुरक्षित बनाई जाए और निःसंदेह यही स्थिति बनी रही।
इस प्रकार से निर्मित मुद्रा-पद्धति किस प्रकार कार्य करने लगी? श्रेष्ठ मुद्रा-पद्धति की मुख्य आवश्यकताओं में से एक आवश्यकता उसके मूल्य का स्थायित्व है परन्तु यदि हम इस दृष्टिकोण से भारतीय मुद्रा की जांच करें तो हमें लगेगा कि इसके मूल्य में इतना उतार-चढ़ाव विद्यमान था कि इस निष्कर्ष से अलग हटना कठिन है कि यह पद्धति एक असफलता थी।
- देखिए माननीय श्री फोवर्स के भाषण दिनांक 13 जुलाई, 1861, एस.एल.सी.पी. 1154
- देखिए माननीय श्री फोखीज का भाषण दिनांक 13 जुलाई, 1861, सुप्रीम लैजिसलेटिव कौंसिल प्रोसींडंग्स
खंड VI पृ. 768
- उन्हें कार्यान्वित करने के लिए अपनाई गई ऐसी अतिरिक्त सुविधाएं और कानून, देखिए कागजी मुद्रा
विधेयक दिनांक 13 जनवरी, 1871 को माननीय सर रिचर्ड टैम्पिल का रोचक भाषण, एस.एल.सी.पी.
खंड ए, पृ. 22-25
- नारद माननीय श्री इस्कोन का भाषण, दिनांक 22 सितम्बर, 1880 एस.एल..सी.पी. खंड VI पृ.1151