72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आंतरिक वाणिज्य के लिए मुद्रा की पर्याप्तता के साक्ष्य के रूप में बट्टे की दर पर विचार किया जाए तो श्री वैन डेन बर्ग जैसे उच्च वित्तीय प्राधिकारी का मत था कि भारतीय मुद्रा बाजार में अप्रत्याशित विकृति और एकाएक संक्रमण विश्व के किसी भाग में किसी अन्य मुद्रा-बाजार के इतिहास में समता नहीं रखते थे। ख्1, भारत मुख्य रूप से ऐसा देश है जहां मौसम की तरह मुद्रा में उतार-चढ़ाव आते रहते है। ख्2, ग्रीष्म ऋतु का मध्यकाल स्वाभाविक रूप से कम कार्यकलाप का समय होता है जबकि शरद ऋतु में सामाजिक और आर्थिक जीवन के सभी कार्यकलापों में शक्ति का पुनः संचार होता है। केवल उत्पाद ही मौसमों से प्रभाजन नहीं होता। उपभोग
- दि मनी मार्किट एंड पेपर करेंसी ऑफ ब्रिटिश इंडिया बटांविया, 1884 पृष्ठ 3
- इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि निष्क्रिय और व्यस्त मौसम देश के समग्र धरातल पर एक
समान रूप से विभाजित नहीं किए जाते। मोटे तौर पर यह विभाजन इस प्रकार हैःµ
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