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रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन

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की दृष्टि से जिसने बनाया, वह ऐसी परिस्थिति थी कि बट्टे की दर में मौसम गत उतार-चढ़ाव काफी असामान्य रहे। ख्1,

ऐसा चमत्कारिक मार्किट अर्थधारणा के लिए देश की मुद्रा आपूर्ति में अनियमितता उत्तरदायी बनाने का प्रयास किया जाता है। मुद्रा को समान मूल्य पर रखे जाने के लिए इसकी मांग में विभिन्नता के अनुसार इसकी आपूर्ति को नियंत्रित किया जाना चाहिए। इस बात को महसूस करना अच्छा है कि मुद्रा की मांग कभी भी स्थिर नहीं होती। परंतु इससे कुछ भी प्राप्त नहीं होगा जब तक इस बात को महसूस न किया जाए कि मुद्रा की मांग में परितर्वन प्रति वर्ष जनसंख्या व्यापार आदि की वृद्धि के कारण होती है मुख्यतया एक वर्ष की अवधि में मौसमी प्रभावों के कारण मुद्रा की मांग में जो उतार-चढ़ाव आता है उससे वह भिन्न वर्ग की होती है किसी भी सुनियमित मुद्रा में यह आवश्यक है कि मुद्रा की मांग के परिवर्तनों में इन दो वर्गों अंतर को पहचाना जाय। एक वर्ग जिसकी आवश्यकता है स्थिरता और विस्तार दूसरा जिसकी आवश्यकता लचीलापन। तुलनात्मक दृष्टि से ऐसा प्रतीत होता है कि यह विश्वसनीयता से भी अधिक है कि धातु मुद्रा विशेष रूप से इसलिए अपनाई गई ताकि वह इसमें स्थिरता और स्थायित्व का तत्व निहित कर सके जैसे कि कागजी मुद्रा लचीलापन प्रदान करती है। सचमुच में इन दोनों के अलग-अलग कार्य कलाप इतने सटीक लगते हैं कि इस बात पर जोर दिया गया है। ख्2, एक आदर्श पद्धति में मुद्रा के ये दोनों स्वरूप मुद्रा को बोझ स्वरूप अथवा

खतरनाक बनाए बिना अपने कार्यों में परस्पर परिवर्तन नहीं कर सकते। इस दृष्टिकोण के परिपक्वता का सबूत यह कहा जा सकता है कि अगर उन थोड़े से लेन-देन को जो वस्तुओं के आदान-प्रदान से होता है, उसको अलग कर दिया जाए तो किसी भी वाणिज्य प्रधान देश का क्रय का माध्यम मुद्रा और ऋण के मिश्रित रूप में निहित है।

  1. बैंक ऑफ बंगाल के बट्टे की दर तीस दिन और बाद के समय तक जारी निजी कागजी मुद्रा (पेपर

करेंसी) बदलानी रही-

1876 में 16 बार न्यूनतम 6 ½ प्रतिशत और अधिकतम 13 ½ प्रतिशत

1877 में 21 बार न्यूनतम 7 ½ प्रतिशत और अधिकतम 14 ½ प्रतिशत

1878 में 10 बार न्यूनतम 5 ½ प्रतिशत और अधिकतम 11 ½ प्रतिशत

1879 में 15 बार न्यूनतम 6 ½ प्रतिशत और अधिकतम 11 ½ प्रतिशत

1880 में 8 बार न्यूनतम 5 ½ प्रतिशत और अधिकतम 9 ½ प्रतिशत

1881 में 9 बार न्यूनतम 5 ½ प्रतिशत और अधिकतम 10 ½ प्रतिशत

1882 में 9 बार न्यूनतम 6 ½ प्रतिशत और अधिकतम 10 ½ प्रतिशत

1883 में 14 बार न्यूनतम 7 ½ प्रतिशत और अधिकतम 10 ½ प्रतिशत

(वॉन डेन बर्ग से उद्धृत)

  1. देखिएµ प्रोफेसर आर. जी. फाकनेर ए. डिस्कशन ऑफ दो इन्ट्रोगेटोरिज ऑफ दी मानेटरी कमीशन

ऑफ दि इन्डियाना पोलिए कन्वेन्शन, 1898, राजनैतिक अर्थव्यवस्था और लोक कानून में पेन्सेलेवानिया

के प्रकाशन, संख्या-13, पृ.25-26