74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
भारतीय मुद्रा देखने में मुद्रा और ऋण का मिश्रित रूप है। इस प्रकार यह अनुमान किया जा सकता है कि इसमें विस्तार तथा लचीलेपन की व्यवस्था है। परंतु जब हम इसका विश्लेषण करते हैं, हम यह पाते है कि इसमें लचीलेपन के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई है। मौसमगत मांगों के साथ इसके विस्तार और संकुचन के लिए ऋण की अनुमति से कहीं दूर कागजी मुद्रा अधिनियम ने इशू की मात्रा पर कठोर सीमा रखी चाहे मांग की मात्रा में कुछ भी परिवर्तन क्यों न हों। इसके बाद यहां भारतीय मुद्रा बाजार में प्रचलित बट्टे की दरों में ऐंठन के कारणों में से एक कारण का पता लगता है। जैसा कि श्री वैन डेन बर्ग ने इंगित कियाµ
‘‘भारतीय विधायक द्वारा स्थापित कागजी मुद्रा अपने उद्देश्य की पूर्णतया
पूर्ति करता है जहां तक व्यापार में सोना अथवा चांदी के सिक्के के बजाए
विनिमय के सरल उपायों की आवश्यकता होती है परन्तु न्यासी मुद्रा के निर्गम
और विनिमय के वर्तमान माध्यम में प्रिवर्तित उनके बिल अथवा अन्य वस्तुएं
रखने के लिए जनता की मांगों के बीच कोई संबंध मौजूद नहीं है........... और
मुद्रा बाजार में अप्रत्याशित ऐंठन और अचानक संक्रमण का एक मात्र कारण है।
अतः उस व्यापार के लिए नितांत हानिप्रद है जिसके लिए ब्रिटिश भारतीय व्यापार
बराबर अनाश्रित छोड़ देता है।’’ ख्1,
फिर भी, यह आपत्ति की जा सकती है कि इस प्रकार का विचार केवल सतही है। भारतीय कागजी मुद्रा अधिनियम (इंडियन पेपर करेंसी एक्ट) सभी आवश्यक रुचि अवयवों की दृष्टि से 1844 के इग्लिश बैंक एक्ट की बिल्कुल नकल है। इंग्लिश बैंक एक्ट के समान ही इसने भी न्यासी नोटों के निर्गम की सुनिश्चित सीमा निर्धारित की। इसके समान इसने भी निर्गम व्यापार को बैंकिंग व्यापार से अलग रखा ख्2, और यदि इसने भारत के बैंकों को केवल बट्टे के बैंक ही बना दिया तो इसका कारण है कि इसने उस बैंक चार्टर एक्ट की नकल की जिसने बैंक ऑफ इंग्लैंड को सम्मिलित करते हुए इंग्लैंड के बैंकों को निर्गम बैंक होने से वंचित किया। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि अंग्रेजी मुद्रा बाजार ‘‘ऐंठन और अचानक संक्रमण द्वारा प्रभावित
सामने का उद्धरण 7
भारतीय कागजी मुद्रा अधिनियम (दि इंडियन पेपर करेंसी एक्ट) ने इंग्लिश बैंक चार्टर एक्ट की तुलना
में अलगाव के सिद्धांत को अपनाया। उसने न केवल बैंकिंग विभाग के तत्वाधान में संचालित निर्गम
विभाग को वंचित किया अपितु दोनों को एक ही छत के नीचे रहने की भी अनुमति न दी। इस प्रकार
की आदर्श प्रथकता के बारे में बैक चार्टर एक्ट पर बहस के दौरान सर चार्ल्स बुड ने अपने विचार
व्यक्त किए। देखिए हैंसार्ड पार्लियामेंट्री डिबेट्स खंड LXXIV पृष्ठ 1363 । यद्यपि वे उस समय
निराश हो गए थे वे अपने आदर्श को चरितार्थ करने में असफल नहीं रहे जब वे भारत के राज्य सचिव
बने। देखिए उनका निबंध ‘‘मुद्रा बाजार में बार-बार शासनकालीन दबाव और बैंक ऑफ इंग्लैंड का
कार्य (फ्रीक्वेंट ऑटोमनल प्रेशर इन द मनी मार्केट एंड दि एक्शन ऑफ दि बैंक ऑफ इंग्लैंड)’’ मुद्रा
और वित्त में छानबीन (इन्वेस्टीगेशन्स इन करेंसी एंड फाइनेंस) (संपादक-फाम्सवेल), 1884 पृष्ठ 179
जेवॉन्स द्वारा इटेलिक्स। फिर भी मूल पाठ में अनायास अशुद्ध छप गया है जो उद्धरण के अंत में इस
प्रकार पढ़ा जाएµ जैसे कि उन्हें प्रतिबंधित पद्धति के अंतर्गत होना था।’’