रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन
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हुआ है जैसी कि भारतीय मुद्रा बाजार की स्थिति रही है’’ दूसरी ओर जेवान्स की सुविचारित राय थी कि ‘‘बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक सामान्यता अपनी अग्रिम राशियों को घटाने अथवा बढ़ाने की समान पद्धति तक एक स्तर रखते है’’ अर्थात् 1884 के एक्ट के अधीन जैसी कि उन्होंने (एन यू एन) सीमित पद्धति में बनाए रखा, ‘‘क्योंकि जैसा कि उन्होंने अन्यत्र प्रतिपादित किया कि यदि न्यासी निर्गम की सीमा स्वेच्छाचारी होती और यदि लोग अधिक धन चाहते हैं’’ तो उनके लिए यह खुली छूट है कि वे इसके स्थान पर धातु-मुद्रा का उपयोग करें। यह सीमा मुद्रा पर ही आरोपित नहीं है अपितु उसके प्रतिनिधित्व करने वाले भाग पर भी लागू होती है। ख्1, इसका क्या कारण है कि भारतीय कागजी मुद्रा अधिनियम (इंडियन पेपर करेंसी एक्ट) में ऐसे अवगुण उत्पन्न हुए जबकि इसके इंग्लिश प्रतिरूप में ऐसे अवगुण नहीं थे? मुख्यरूप से ऐसे कानून के अधीन मुद्रा बाजार में इस प्रकार के ऐंठन की आवश्यकता नहीं है। नोटों के निर्गम के परिसीमन द्वारा इस अधिनियम ने कोई भी विकल्प नहीं छोड़ा सिवाय मौसमगत मांग के लिए धातु-मुद्रा का उपयोग। यह सत्य होगा यदि नोट ही केवल ऐसा स्वरूप होता जिनमें उधार का उपयोग किया गया है। वास्तव में ऐसा नहीं है। ऋण का एक स्वरूप यह हो सकता है कि भुगतान का वचन माना जाए यह ऋण बैंक द्वारा जारी किया गया और भुगतान के लिए बैंक पर इसका स्वरूप आदेश बन सका तथा इसमें उन लोगों की सामाजिक अर्थव्यवस्था में कोई अंतर नहीं बना जिन्होंने इसका उपयोग किया था। इसके फलस्वरूप यदि अधिनियम के उपबंधों के अधीन बैंक भुगतान के वचन देने से प्रतिबंधित हो जाते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि इसके लिए एक मात्र खुला मार्ग रह गया कि वे ‘‘धातु-मुद्रा का उपयोग’’ करने लगें क्योंकि वे समान रूप से इस बात के लिए स्वतंत्र हैं कि वे भुगतान के उतने ही आदेशों का पालन करें जितने वे चाहें। वास्तव में अधिनियम की सफलता अथवा असफलता इस बात पर निर्भर है कि इन दोनों विकल्पों में से कौन सा विकल्प बैंक अपनाएं। यह स्पष्ट है कि जो अधिनियम के आदेशों का पालन करेंगे तथा धातु मुद्रा में काम करेंगे, उन्हें ‘‘ऐंठन स्वीकार करने होंगे और जो ऋण के अन्य स्वरूपों के उपयोग द्वारा अधिनियम का परिगमन करेंगे, वे उनसे बच जाएंगे। मुख्य कारण है कि जहां इस अधिनियम ने इंग्लैंड में इतना अच्छा काम किया वहां भारत में बुरी तरह असफल रह गया। इसका कारण है कि जहां अंग्रेजी बैंकों ने आदेशों चेक पद्धति को नोटों के स्थान पर ऋण को अपना लिया वहां पर दुर्भाग्य से भारतीय बैंक ऐसा करने में असफल हुए। उनको असफल होने से कोई रोक नहीं सकता था। चैक पद्धति में यह मान लिया जाता है कि जनता पढ़ी-लिखी है और बैंक पद्धति लोगों की देशी भाषा में अपना काम-काज चलाती है। भारत में इन दोनों में से एक भी स्थिति नहीं है यहां की आबादी अधिकांश अनपढ़ों की है और यदि ऐसा नहीं भी होता तब भी
- मनी एंड दि मेकेनिज्म ऑफ एक्सचेंज, केगिन पॉल, लंदन, 1890 पृष्ठ 225