आर्यों के विरूद्ध कार्य
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का निवासी होने का संकेत देते हैं। गाल्वा, लाजिक पर्वत माला और उसके पड़ोस के लोगों की आंखें भूरी, बाल काले, अच्छी कद-काठी है, अधिकांश भागों में शिरोमाप 86 है। इस क्षेत्र से इसी शारीरिक श्रेणी के लोगों की श्रृंखला अनवरत रूप से पश्चिम की ओर एशिया माइनर और यूरोप में फैलती गई। अल्पाइन लोगों द्वारा अधिग्रहीत पश्चिम एशिया के व्यापक क्षेत्रों के अनुसंधान का एकमात्र बिंदु यह है कि वह इस प्रजाति की विशिष्टताओं की घनिष्टता पर बल देता है। टैपीनर के अनुसार एशिया से आव्रजन का यह कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। जब हम चौड़े सिर वाले लोगों के मूल निवास का पता लगाना चाहते हैं तो हमारा ध्यान पूर्व की ओर जाता है। इस जाति के मूल आधार के धुंधले संकेत मिलते हैं। वह पश्चिमोन्मुख नहीं है क्योंकि अटलांटिक से यह प्रजाति धीरे-धीरे लुप्त हो गई। हमें केवल अफ्रीका नीग्रो जाति के रूप में लंबे सिर वाली जाति का पता चलता है। इस प्रकार अल्पाइन जाति का मूल स्थान पूर्व में और मेडिटरेनियन जाति का मूल स्थान दक्षिण में सिद्ध होता है।’’
प्रायः इस बात पर कुछ मतभेद ख्1, हैं कि यूरोप में आर्य भाषा का प्रचलन नौर्डिक्स (इंडो-जर्मन) अथवा अल्पाइन जाति द्वारा किया गया। किन्तु सभी विद्वान यह स्वीकार करते हैं कि अल्पाइन लोगों की भाषा ‘‘आर्य’’ थी। अतः अल्पाइन आर्य थे।
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उपरोक्त तथ्य ऋग्वेद के इस कथन की पुष्टि करते हैं कि नृविज्ञान और ऐतिहासिक दृष्टि से भारत में आर्यों की दो जनजातियां थी।, न कि एक। वहां इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि ऋग्वेद के प्रमाण साक्ष्य और पाश्चात्य मत में परस्पर विरोध हैं क्योंकि पाश्चात्य सिद्धांत आर्य प्रजाति की बात कहता है जबकि ऋग्वेद में दो भिन्न जातियों का वर्णन है। इस प्रकार पाश्चात्य सिद्धांत का ऋग्वेद से इस गहन विषय पर विभेद है। उनके मतम को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इस विरोधाभास से ‘‘आक्रमण’’ और ‘‘विजय’’ के संबंध में भी मतभेद पैदा होते हैं। हम नहीं जानते कि आर्यों की किस जाति का आगमन भारत में पहले हुआ। किंतु यदि हिमालय के निकटवर्ती क्षेत्रों के निवास करने वाली अल्पाइन जाति पहले आई थी तो आर्यों के बारह से आने और आक्रमण करने का सिद्धांत ही गलत सिद्ध हो जाता है। जहां तक भारत के मूल निवासियों पर विजय की बात का संबंध है, इस प्रश्न का उत्तर इतना सरल नहीं है जिसका पाश्चात्य विद्वान समझ बैठे हैं। प्रायः यह संभावना व्यक्त की जाती है कि दास और दस्यु भारत के मूल निवासी थे और आर्यों से भिन्न जाति थे। आर्यों ने उन्हेंं पराजित किया, यह तो एक काल्पनिक उड़ान मात्र है। यह भी तो संभव
- मेडीसन ग्रांटः दि पासिंग आफ ग्रेट रेस (1922) पृष्ठ 238-239