अध्याय 6
शूद्र और दास
पिछले अध्याय में यह सिद्ध हो गया है कि पाश्चात्य सिद्धांत कितने निराधार हैं। अब उस सिद्धांत को लेकर एक ही भाग शेष रह जाता हैः- शूद्र कौन थे? ‘‘श्री ए. सी. दास का कथन है ख्1, ःµ
‘‘दास और दस्यु या तो बनवासी थे या वैदिक आर्य जाति से भिन्न आर्य
आदिवासी थे। उनमें से जो युद्धवंदी हुए उन्हें संभवतः दास बना कर शूद्र जाति
बना दिया।’’
अन्य एक वेदविज्ञ और पश्चिमी देशों के लेखकों के विचारों के समर्थक श्री काणे ख्2, का विचार हैः- परवर्ती साहित्य में दास का अर्थ खेतिहर दास या केवल मजदूर दास होता है। इसका अभिप्रायः यह है कि ऋग्वेद के अनुसार दासों ने आर्यों का प्रतिरोध किया और फिर वे निरंतर युद्ध में पराजित हुए और उन्हें कार्यों की सेवा करने को विवश होना पड़ा। मनुस्मृति (8.4.13) में उल्लेख है कि शूद्रों को ब्रह्मा ने ब्राह्मणों की सेवा के लिए ही बनाया है। तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय बाह्मण और अन्य ब्राह्मण गं्रथों में शूद्रों की स्थिति ऐसी ही बताई गई है जैसी स्मृतियों में है। इसलिए यह मानना होगा कि दास अथवा दस्यु आर्यों द्वारा पराजित हुए और कालांतर में शूद्र जाति में परिवर्तित हो गए।’’
इस मत के अनुसार दास और दस्यु ही शूद्र हैं। साथ ही शूद्र अनार्य थे और वे भारत की प्राचीन सभ्यता की आदिम जाति थे। इसी विचार का हम विश्लेषण करेंगे।
प्रथम बात भी दो प्रकार की है। पहला विचार है कि दास और दस्यु एक ही हैं और दूसरा विचार यह है कि दास और दस्यु ही शूद्र हैं। पहला विचार कि दास और दस्यु एक ही हैं, संदिग्ध है। ऋग्वेद में उनके संबंध में पाए जाने वाले वृतांत निर्णायक नहीं हैं। कुछ स्थानों पर दासों और दस्युओं के संबंध में किए गए वर्णनों में ऐसा प्रतीत होता है कि उनमें कोई अंतर कोई नहीं है। शाम्बर, भूषण, वृत्र और पिप्रू का दास और दस्यु दोनों अर्थ में वर्णन है। दास और दस्यु ही इंद्र और अन्य देवों के विशेष रूप से
ऋग्वैदिक कल्चर, पृष्ठ 133
धर्मशास्त्र 2(1) पृष्ठ 33