अध्याय 6. शूद्र और दास - Page 103

88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

अश्विनी कुमारों के शत्रु माने गए हैं। ऐसा भी वर्णन मिलता है कि इंद्र और देवों ने इन दोनों के नगरों को ध्वस्त कर दिया। दासों और दस्युओं की पराजय से समान प्रभाव पड़ा। अर्थात प्रकाश का उदय और जल की मुक्ति। दभिति की मुक्ति का वर्णन करते हुए दास और दस्यु दोनों का वर्णन एक साथ किया गया है। एक स्थान पर कहा गया है कि दाभिति को दासों से छुड़ाया गया और दूसरे स्थान पर दस्युओं से छुड़ाया गया बताया गया है।

उपरोक्त वर्णनों से ज्ञात होता है कि दास और दस्यु एक ही थे। जबकि अन्यत्र दोनों का पृथक-पृथक वर्णन है। ऋग्वेद में ‘‘दास’’ शब्द 54 बार तथा दस्यु शब्द 78 बार पृथक-पृथक आया है। इससे यह तथ्य प्रकट होता है कि दोनों भिन्न थे, क्योंकि यदि दोनों भिन्न नहीं थे तो फिर इनके वर्णन में भिन्नता क्यों है? संभावना यही है कि दोनों पृथक-पृथक समुदायों या जातियों के थे।

जहां तक शूद्रों का प्रश्न है यह कहना कि वे भी दासों ओर दस्युओं की जाति के थे, निराधार है। शूद्र शब्द की व्याख्या करने पर शुक (शोक) और (विजित) मिलकर शोक से विजित अर्थ निकलता है। इस संबंध में वेदांत सूत्र (1.3.34) में जनश्रुति की कथा है। इसमें राजहंसों ख्1, द्वारा उनके विषय में घृणास्पद वर्णन किए जाने से वे शोक ग्रस्त हो गए। विषणु पुराण ख्2, में भी इसी प्रकार की कथा है।

उपरोक्त वर्णन कितने प्रमाणित हैं? शूद्र शब्द का मूल स्वतंत्र शब्द न होकर व्युत्पत्ति किया हुआ मानना शब्दों की अनुचित व्याख्या करना है। ब्राह्मणवादी लेखक मिथ्या या झूठ शब्द गढ़ने के प्रवीण हैं। ऐसा कोई भी शब्द नहीं जिसकी व्युत्पत्ति वे भिन्न प्रकार से प्रस्तुत न कर सकें। प्रोफेसर मैक्समलर ख्3, ने ब्राह्मणवादी लेखकों के द्वारा उपनिषद शब्द की भिन्न-भिन्न प्रकार की व्युत्पत्ति के संबंध में कहा हैः-

‘‘उपनिषद शब्द की व्युत्पत्ति को चतुराई से विपरीत व्याख्या के ढांचे में इस

प्रकार गढ़ा गया है कि यह देशी छात्र की समझ से बाहर रहे। किसी भी शब्द के

प्रचलित अर्थ जो किसी अर्द्यशिक्षित की समझ में भी आ जाएं तो ही उन्हें व्युत्पत्ति

का आधार बनाना चाहिए। इस व्युत्पत्ति में आरण्यक शब्द नहीं आता और इसका

संबंध उपनिषद शब्द से न होते हुए भी सामान्य अर्थ में सटीक बैठता है।’’

यहीं बात वेदांत सूत्र और वायु पुराण के ‘‘शूद्र’’ शब्द के संबंध में प्रकट होती है, जिसमें शूद्र का अर्थ शोक ग्रस्त लोग स्थापित किया गया है। अतः इस अर्थ को हमें निरर्थक और मूर्खता मानकर अस्वीकृत कर देना होगा।

  1. काणे धर्म सूत्र 2(1), पृष्ठ 155

  2. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 97

  3. उपनिषद, इंट्रोडक्शन, पृष्ठ 69-71