शूद्र और दास
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इस कथन के संबंध में हमारे पास प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं कि शूद्र एक कबीले या वर्ग की व्यक्तिवाचक संज्ञा है। यह शब्द किसी प्रकृति का प्रतीक नहीं है जैसाकि कहा गया है।
इस कथन के पक्ष में विभिन्न साक्ष्य मौजूद हैं। सिकंदर के आक्रमण के समय भारत आए इतिहासकारों ने कई स्वतंत्र गणराज्यों का उल्लेख किया है जिनसे सिंकदर को लोहा लेना पड़ा। ऐसे कई स्वतंत्र और प्रभाव संपन्न गणराज्य थे। निस्संदेह इन कबीलों को कई नामों से जाना जाता था। इनमें से एक सोद्री भी था। यह काफी विख्यात कबीला था जिसने सिकंदर का सामना किया। यद्यपि वह उससे पराजित हो गया था। इसे प्राचीन शूद्रों के रूप में मानने वाले बहुत कम हैं। पंतजलि ने अपने महाभाष्य के श्लोक 1,2,3, में शूद्रों का उल्लेख किया है और उनका संबंध ‘‘आभीरों’’ से बताया है। महाभारत के सभा पर्व से 32वें अध्याय में एक शूद्र गणराज्य का उल्लेख है। विष्णु पुराण, मारकण्डेय पुराण और ब्रह्म पुराण में भी इसे अनेक कबीलों के समान एक कबीला बताया गया है और उन्हें विंध्याचल ख्1, के दक्षिणी भाग का निवासी कहा है।
II
अब दूसरी बात पर आते हैं और उसे विभिन्न पक्षों का निरूपण करते हैं। इस विषय में दो तथ्य हैं। पहला है, क्या दस्यु और दास शब्दों का प्रयोग अनार्य कबीलों की किसी जाति का सूचक है? दूसरी बात यह है कि मान भी लें कि ऐसा है तो क्या यह स्वीकार करने का कोई अन्य कारण भी है कि वे भारत की मूल जन जाति थे? जब तक इन दोनों का सकारात्मक उत्तर नहीं मिल पाता, तब तक दस्यु और दासों को शूद्र नहीं कहा जा सकता।
जहां तक दस्युओं का प्रश्न है ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता कि इन्हें अनार्य जाति के रूप में माना जा सकता है। दूसरी ओर इस निष्कर्ष के पक्ष में ऐसे ठोस प्रमाण मौजूद हैं कि दस्यु शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया गया है जो आर्यों के धर्म का पालन नहीं करते थे। इस संबंध में महाभारत के शांति पर्व के 65वें अध्याय का 23वां श्लोक देखा जा सकता हैः-
दृश्यन्ते मानुषे लीके सर्ववर्णेषु दस्यवः।
लिंगान्तरे वर्तमाना आश्रमेषुचतुर्ष्वपि।।
अर्थात ‘‘सभी वर्णों और सभी आश्रमों में दस्यु विद्यमान है।’’
यह कहना कठिन है कि दस्यु शब्द का मूल क्या है? किंतु एक विचार है कि यह भारतीय आर्यो द्वारा भारतीय ईरानियों के लिए कथित ‘‘अपशब्द’’ हैं यह अस्वाभाविक या
- बी. सी. लॉ पृष्ठ 350 पर कबीलों का संदर्भ देखें।