90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
अप्रासंगिक भी नहीं है क्योंकि इतिहास में दोनों के मध्य हुये संघर्ष का वर्णन मिलता हैं। इसलिए यह बिल्कुल संभव है कि भारतीय आर्यों ने अपशब्द के रूप में इस शब्द का अपने शत्रुओं के लिए प्रयोग किया होगा और यह वास्तविकता है। अतः दस्यु भारतीय मूलवंश के नहीं हो सकते।
दास शब्द के संबंध में प्रश्न उठता है कि क्या ‘‘जैड़ अवैस्ता’’ में उल्लिखित ‘‘अजि दाहक’’ का ‘‘दास’’ से कोई संबंध है। अजिदाहक समास है इस के दो पद हैं। इसके अन्वय करने पर अजि का अर्थ सर्प और दाहक के मूल दाह का अर्थ डंक मारना है। ‘‘अजिदाहक’’ का अर्थ है डंक मारने वाला सर्प। भारतीय ईरानियों में ‘‘जोहक’’ एक व्यक्तिवाचक संज्ञा है। यह शब्द यश्ट साहित्य में बहुत स्थानों पर प्रयोग किया गया है। कहा जाता है कि ‘‘जोहक’’ ने बेबीलोन में सुंदर महल और वेधशाला का निर्माण कराया था। शक्तिशाली शैतान के प्रधान अंगार मैन्यू ने अजिदाहक को विश्व की पवित्रता नष्ट करने के लिए उत्पन्न किया और इस अजिदाहक ने भारतीय ईरानियों के सम्राट यिमा को युद्ध में परास्त कर मार डाला।
यिमा को अवेस्ता में क्षेता कहते हैं जिसका अभिप्रायः प्रकाशमान अथवा शासक से है। इसके मूल ‘क्षि’ के दो अर्थ हैं (1) प्रकाशित रहना (2) शासन करना। यिमा को हवांथवा भी कहते हैं जिसका अर्थ हैं, बड़े समुदाय का अधिकारी। यह अवेस्ता का यिमा क्षेता फारसी भाषा में जमशेद हो गया। विवांधवंत का पुत्र जमशेद ईरानी इतिहास में फारसी सभ्यता के विकास का महान नायक हुआ। यह येश्दियद्यान वंश का सम्राट था। यासना 9 और 5 (कोयमा याशी) मेंं कहा गया है कि विवंश ही प्रथम मनुष्य था जिसने हशमा (सक ससमा) को भौतिक जगत में लाकर घेरा डाल दिया और वरदान प्राप्त किया। इससे उेस ‘‘यिमा’’ पुत्र की प्राप्ति हुई जो मनुष्यों में सूर्य के साथ प्रकाशमान था और उसके साथ अमरत्व प्राप्त मनुष्य, पशु, पक्षी, फल और सदाबहार पेड़, पौधे उत्पन्न हुए। यिमा को व्यक्तित्व दैवी या कभी न मुरझाने वाला सदैव ताजगी से परिपूर्ण था। उसके राज्य में न अधिक ठंड पड़ती थी ओर न गर्मी पड़ती थी और न ही जरावस्था, मृत्यु एवं अस्वस्थता किसी को सताती थी।
क्या जिंद अवेस्ता का दाहक ही ऋग्वेद का दास है? यदि नामों की समानता को साक्ष्य मान कर चलें तो निश्चित रूप से दास और दाहक एक ही हैं। संस्कृत के दास शब्द का अवेस्ता में दाह होना स्वाभाविक है। फारसी में साधारण रूप से संस्कृत का ‘‘स’’ ‘‘ह’’ हो जाता है। ऋग्वेद के दास और जिंदा अवेस्ता के दाहक में शब्दों की समानता का ही एक मात्र प्रमाण प्रस्तुत किया जाए तो इसे केवल अटकलबाजी ही कहा जा सकता है। यासना हा 9 (हार्न याशे की भांति) अजिदाहक के तीन मुंह, तीन सिर और 6 आंखों का वर्णन है। (ऋग्वेद 10.99.6) में दास के भी तीन सिर और 6 आंखें ख्1,
- दास और दस्यु की पहचान के लिए देखें महाराष्ट्र ज्ञान कोष खंड 3 पृष्ठ 53 देखें।