अध्याय 6. शूद्र और दास - Page 106

शूद्र और दास

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बताई गई हैं। इसके साथ ही यदि उपरोक्त के अनुसार दास और दाहक एक माने जाते हैं तो दास भारत के मूल निवासी प्राचीन आदिवासी सिद्ध नहीं होते।

III

क्या वे असभ्य बनवासी थे? ऋग्वेद से प्रमाणित होता है कि दास और दस्यु आदिम जाति नहीं थे। वास्तव में वे भारतीय आर्यों की अपेक्षा अधिक सभ्य और शक्तिशाली थे। श्री आयंगर ने लिखा हैः-

‘‘दस्यु नगरों में रहते थे (ऋग्वेद I .53.8.1., 1.103.3) और उनके अपने सम्राट

थे जिनका विवरण मिलता है। उनके पास गौ, घोड़े और रथों (2-15.4) के रूप

मेंं बहुत धन था (8.40.6)। एक सौ फाटकों वाले नगर थे ( x. 99.8)। इंद्र ने

उनकी समस्त संपत्ति लेकर अपने भक्त आर्यों को दे दी, ( I .176.4)। दस्यु धनी

थे ( I .33.4)। मैदानों और पर्वत शिखरों पर उनकी निजी संपत्ति थी (60.69.6)।

उनकी वेशभूषा स्वर्ण रत्न जटिल होती है ( I .33.8)। वे अनेक दुर्गों के स्वामी थे

( I .33.13, 8.17.18)। दस्यु असुर और आर्य देवगुण समान रूप से स्वर्ण, रजत

और लौह दुर्गों में रहते थे (सं.रा. 6.23_ अथर्ववेद 5.28.9_ ऋग्वेद 2.20.8)। इंद्र

ने अपने उपासक दिवोदास की प्रार्थना को ठुकराते हुए दस्युओं के पत्थर के सौ

दुर्गों को ध्वस्त कर दिया। ख्1, (5.30.20)। आर्यों की उपासना से तुष्ट होकर अग्नि

ने दस्युओं के किलों को जला कर नष्ट कर दिया (7.5.3)। जहां आर्यों के पशु

बंद थे पत्थरों के उन कारागारों को बृहस्पति ने तोड़ दिया (4.67.3)। दस्युओं के

पास आर्यों के समान रथ थे, जिन पर आरूढ़ होकर उन्होंने युद्ध किया (8.24.27,

3.30.5, 2.15.4)।’’

दास और दस्यु शूद्रों के समान थे। यह सिद्धांत अनुमान पर आधारित प्रतीत होता है। यह कपोल कल्पना मात्र है यह केवल इसलिए बर्दाश्त कर लिया गया, क्योंकि जिनकी यह मान्यता है वे सम्मानित विद्वान हैं। जहां तक साक्ष्य का प्रश्न है, इसका कोई भी अंश साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। जैसाकि पहले कहा जा चुका है दास ऋग्वेद में 54 बार और दस्यु 78 बार प्रयुक्त हुआ है। प्रायः दास और दस्यु साथ-साथ प्रयुक्त हुए। शूद्र केवल एक बार प्रयुक्त हुआ है वह भी दास और दस्यु के अर्थ में नहीं। उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए यह सिद्ध करना किसी के लिए भी दुष्कर है कि दास और दस्यु अन्य वैदिक साहित्य में लुप्त हो गए हैं। इससे यह अभिप्रायः निकलता है कि वैदिक आर्यों द्वारा ये विलीन कर दिए गए। किंतु शूद्र के साथ ऐसा नहीं हुआ। वरन् बाद के वैदिक साहित्य में इसकी भरमार है। इससे यह स्पष्ट प्रकट होता है कि शूद्र दास और दस्यु के भिन्न थे।

  1. काणे, धर्मशास्त्र-2, (1) पृष्ठ 35