92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
IV
क्या शूद्र अनार्य थे? काणे का कथन है ख्1, ःµ
‘‘शूद्र और आर्य के मध्य ब्राह्मण साहित्य और धर्मशास्त्रों में भी स्पष्ट विभाजन
रेखा मिलती है। तांडय ब्राह्मण में शूद्रों और कार्यों के मध्य छदम युद्ध का वर्णन
है। इसे इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता था कि आर्य ही विजयी रहे। आपस्तम्ब धर्म
सूत्र (1.1.3.40-41)में वर्णन है कि ब्रह्मचारी भिक्षा मांग कर लाए हुए समस्त खाद्य
पदार्थ को यदि न खा सके तो वह शेष को किसी आर्य के समीप रख दे या अपने
गुरू के किसी दास (सेवक) जो शूद्र हो, उसे दे दें। इसी प्रकार गौतम धर्म सूत्र
(10.69) में शूद्र के लिए अनार्य शब्द प्रयुक्त हुआ है।’’
शूद्र और आर्य के मध्य सीमा रेखा खींचने के प्रश्न पर सावधानीपूर्वक निरीक्षण करना होगा। शूद्र अनार्थ थे इस तर्क को बल प्रदान करने के लिए निम्न कथन द्रष्टव्य हैःµ
‘‘अथर्ववेद (4.20.4) सहस्र आंख वाला देव इस पौधे को मेरे दाए हाथ पर
रख दें। मैं इसके द्वारा शूद्रों और आर्यों दोनों में से प्रत्येक को देखता हूं।’’
कथक संहिता (34.5) ‘‘शूद्र और आय चमड़े के लिए झगड़ा करते हैं। देव
और असुर सूर्य के लिए झगड़े। देवों ने विजय प्राप्त कर सूर्य को पा लिया। (शूद्रों
के साथ झगड़े में) आर्यों की विजय हुई। आर्य वेदी (पूजा स्थल) के अंदर प्रवेश
कर गए और शूद्र बाहर हो गए। सूर्य की भांति आर्यों की चमड़ी श्वेत वर्ण की
हो गई है।’’
वाजसनेयी संहिता (23-30.30) - ‘‘जब एक हिरण खेत में जौ की फसल खाता
है तो खेत का मालिक उस पृष्ठ हिरन से उसी प्रकार प्रसन्न नहीं होता जैसे आर्य स्त्री
के शूद्र की पे्रयसी होने से (उसका पति) प्रसन्नता की अनुभूति नहीं करता।’’
जैसे खेत में हिरण के जौ की फसल खाने पर (खेत का मालिक) उसके पुष्ठ होने पर प्रसन्न नहीं होता। उसी प्रकार शूद्र पुरुष किसी अन्य स्त्री को अपनी प्रेयसी बनाए तो (आर्य पति) प्रसन्न नहीं होता। ये ऋचाएं जिनमें शूद्र और आर्य पृथक-पृथक बताए गए हैं और शूद्रों को अनार्य कहे जाने वाले विचारों का विरोध किया गया है। अतः उनसे किसी परिणाम पर पहुंचना तर्कसंगत नहीं होगा। मस्तिष्क में दो विचार धारण करने होंगेµ प्रथम यह कि पूर्व कथन एवं ऋग्वेद के साक्ष्य के अनुसार आर्यों की दो श्रेणियां थींµ ‘‘वैदिक’’ और दूसरी ‘‘अवैदिक’’। इस तथ्य के आधार पर एक श्रेणी के आर्य के लिए दूसरी श्रेणी वाले को आर्य कहना सरल होगा। यद्यपि दोनों एक दूसरे से भिन्न और विपरीत थे। इस प्रकार के वर्णन से कि शूद्र आर्यों के विरोधी थे, यह तात्पर्य नहीं निकलता कि
- काणे, धर्मशास्त्र-2 (1) पृष्ठ 35