अध्याय 6. शूद्र और दास - Page 108

शूद्र और दास

शूद्र आर्य नहीं थे। वास्तविक रूप से वे भिन्न वर्ग या समूह के आर्य थे।

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हिंदूओं के पवित्र ग्रंथों से यह प्रमाणित होता हैःµ

  1. अथर्ववेद (19.32.8) - ‘‘हे दूर्वा (घास)’’ मुझे ब्राह्मणों, राजन्यों, क्षत्रियों,

शूद्रों और आर्यों का तथा उनका जिन्हें हम प्रेम करते हैं एवं प्रत्येक वह जो

देख सकते हैं उनका प्रिय बना दो।’’

  1. अथर्ववेद (19.62.1) - ‘‘मुझे देवों, राजपुरुषों तथा उनका जो शूद्रों और आर्यों

को देख सकता है प्रिय बना दो।’’

  1. वाजसनेयी संहिता (1.18.48) - (हे अग्नि) मुझे ब्राह्मणों, राजाओं, वैश्यों

और शूद्रों जैसा तेज दो। मुझे अधिकाधिक तेज दों’’

  1. वाजसनेयी संहिता (20.17) - ‘‘जो पाप हमने गांव में, जंगल में, सभा में

अपनी जानकारी से शूद्रा अथवा आर्यों से किया हो, जो भी पाप हम में (दोनों,

यज्ञ कराने वाला और उसकी स्त्री) से किसी ने अपने कर्तव्य के दौरान (दूसरों

के प्रति) किया हो उसे नष्ट कर दो।’’

  1. वाजसनेयी संहिता (18.48) - ‘‘जैसे मैं जनता, ब्राह्मणों, राजाओं, शूद्रों, आर्यों

को व अपने निजी शत्रुओं को आशीर्वाद देता हूं। वैसे ही देवों व दक्षिणा देने

वालों का इस लोक में प्रिय बनूं। मेरी यह अभिलाषा स्वीकृत हो। मेरा ......रे

अधीन रहे।’’

उपरोक्त कथनों से क्या स्पष्ट होता है? प्रथम में तो आर्यों और ब्राह्मणों में अंतर स्पष्ट होता है। क्या यह कहा जा सकता है कि ब्राह्मण आर्य नहीं थे। दूसरे कथन में शूद्रों के लिए प्रेम और सदभावना की कामना की गई है। यदि शूद्र मूलवंशीय अनार्य होते तो क्या इस प्रकार की कामना हेतु प्रार्थना संभव होती? इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि शूद्र अनार्य थे।

धर्म सूत्र शूद्रों को अनार्य बनाते हैं और वाजसनेयी संहिता शूद्र स्त्रियों पर आक्षेप करती है। ये व्यर्थ की बातें हैं। धर्म सूत्रों की व्याख्या के संबंध में दो तर्क हैं - प्रथम धर्म सूत्र तथा अन्य ग्रंथ शूद्रों के विरोधियों द्वारा रचित हैं। अतः इन को प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता। दूसरी बात यह है कि इन ग्रंथों में दिए गए विवण तर्कहीन हैं तथा अन्य पुस्तकों में दिए गए विचारों के विपरीत हैं।

धर्म सूत्रों के अनुसार शूद्र उपनयन संस्कार का अधिकारी नहीं है जब कि गणपति संस्कार के अनुसार उसे इसका ख्1, अधिकार है।

धर्म सूत्र शूद्र को वेदाध्ययन का पात्र नहीं मानते। किंतु छान्दोग्योणानिषद (6-1-2)

1 मैक्समूलर एनंसिएंट संस्कृत लिटरेचर (1860) पृष्ठ 207