अध्याय 6. शूद्र और दास - Page 109

94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

की कथा है - जनश्रुति शूद्र को रैक्व ने वेदाध्ययन कराया। इससे भी बढ़कर यह बात है कि कवश ऐलूश ख्1, ऋषि शूद्र थे। उपरोक्तानुसार और ऋग्वेद के दसवें मंडल में उनके द्वारा रचित अनेक मंत्र हैं।

धर्म सूत्र कहते हैं कि शूद्र वैदिक उत्सवों और यज्ञ में सम्मिलित होने का अधिकारी नहीं है। पूर्व मीमांसा ख्2, के रचियता जैमिनी ने बदरी नामक एक अध्यापक के विषय में (जिसकी रचनाएं नष्ट हो गई हैं) में कहा है कि हम अंतिम मीमांसा शास्त्री हैं। बदरी के अनुसार शूद्र वैदिक यज्ञ कर सकते हैं। भारद्वाज श्रोत सूत्र (5.28) के अनुसार शूद्र यज्ञ में तीन अग्नि प्रज्वलित कर सकता है। इसी प्रकार कात्यायन श्रोत सूत्र (1.4.16) के टीकाकार के अनुसार शूद्र वैदिक संस्कारों का अधिकारी है। धर्म सूत्र का कहना है कि शूद्र पवित्र सोमरस पान करने का अधिकारी नहीं है, जबकि अश्विनी कुमारों की कथा के अनुसार शूद्र दैवी सोमरस पान का पात्र है। अश्विनी कुमारों की कथा के अनुसार अश्विनी कुमारों ने सुकन्या नामक युवती को स्नान करते समय नग्नावस्था में देखा। वह च्यवन ऋषि की पत्नी थी जो इतने वृद्ध थे कि आज मरे कल मरे। उसके सौंदर्य पर मुग्ध होकर उन्होंने कहा कि हम में से किसी एक को अपना पति चुन लो। अपना सौंदर्य इस प्रकार नष्ट न करो। सुकन्या ने पतिव्रत धर्म का ध्यान रखते हुए उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। अश्विनी कुमारों ने पुनः सुकन्या को विचलित करने का प्रयास करते हुए उसके सामने यह प्रस्ताव रखा कि वे देवताओं के चिकित्सक हैं और उनके पति को युवा और सुन्दर बनाने की क्षमता रखते हैं। अतः वह उनमें से किसी एक को पति के रूप में स्वीकार करे। सुकन्या अपने पति च्यवन के पास गई और अश्विनी कुमारों की शर्तों के विषय में उनकी अनुमति मांगी, च्यवन ने कहा, ‘‘ऐसा ही करो। शर्त के अनुसार च्यवन ने युवावस्था और सौंदर्य प्राप्त किया। यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या अश्विनी कुमार सोमरस पान के अधिकारी थे। च्यवन ने प्रसन्न होकर इंद्र से अश्विनी कुमारों को सोमरस देने का आग्रह किया। इंद्र ने यद्यपि अश्विनी कुमारों के शूद्र होने के कारण सोमरस देने में आनाकानी की किंतु च्यवन ने इंद्र को समझा बुझाकर सोमरस ख्3, दिलवा दिया।’’

इस कथन के विरुद्ध भी स्पष्ट साक्ष्य हैं कि धर्म सूत्रों ने शूद्रों को अनार्य घोषित किया है और कहा है कि इन्हें स्वीकार नहीं किया जाए। सर्वप्रथम यह मनु के मत के प्रतिकूल है। यह निर्णय लेने में कि क्या शूद्र आर्य थे या कि अनार्य मनुस्मृति के निम्नलिखित मंत्र ध्यान में देने योग्य हैंःµ

‘‘शूद्र स्त्री से उत्पन्न कन्या यदि ब्राह्मण के साथ विवाहित की जाए और आगे भी यही क्रम जारी रहे तो अपनी सातवीं पीढ़ी में नीच योनी से उद्धार पाकर ब्राह्मण हो जाती है।’’

  1. मैक्समूलर एनंसिएंट संस्कृत लिटरेचर (1860) पृष्ठ 58

  2. अध्याय 6, पद 1, सूत्र 27

  3. बी फोसबाल, इंडियन माइथेलाजी, पृ. 128-134