अध्याय 6. शूद्र और दास - Page 110

शूद्र और दास

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‘‘जिस प्रकार कोई शूद्र ब्राह्मणत्व को और कोई ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त होता है उसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न शूद्र भी क्षत्रिय और वैश्यत्व को प्राप्त होता है।’’

ब्राह्मण से इच्छापूर्वक (अविवाहित) शूद्र कन्या से और शूद्र से ब्राह्मण कन्या से (उत्पन्न पुत्र) इन दोनों मेंं श्रेष्ठ कौन है। ऐसी शंका परµ

ब्राह्मण पुरुष और शूद्र कन्या से उत्पन्न शूद्र पाकादि यज्ञ गुणों के युक्त होने के कारण श्रेष्ठ हैं। शूद्र पुरुष और ब्राह्मण कन्या से उत्पन्न पुत्र प्रतिलोमज होने के कारण अमर्यादित है। यही निर्णय ख्1, है।

उपरोक्त श्लोक संख्या 64 जैसा ही श्लोक गौतम धर्म सूत्र (22) में भी है। इस श्लोक का ठीक अर्थ विवादास्पद है। इन विवादों के विषय में बुहलर का कथन हैः-

‘‘मेघ, गब, कुल्ल और राघ जैसे पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार श्लोक का अर्थ है- यदि किसी ब्राह्मण की कन्या और शूद्र और उसके उत्तराधिकारी सभी किसी ब्राह्मण से विवाह करें तो छठी-पीढ़ी के दंपत्ति ब्राह्मण माने जाएंगे। यद्यपि वह अर्थ हरदत्त की टीका से मिलता है, किंतु नार और नान के बिल्कुल भिन्न व्याख्या की है। उनके अनुसार पारशव (शूद्र माता ब्राह्मण पिता की संतान) पुत्र अन्य श्रेष्ठ, गुणी, सचरित्र, पारशव कन्या से विवाह करता है और उसके उत्तराधिकारी भी ऐसा ही करते हैं तो छठी पीढ़ी में उत्पन्न संतान ब्राह्मण मानी जाएगी। नन्दन ने भी इस अर्थ को प्रमाणित माना है। बौद्धायन (1.16.13.14) के अनुसार निषाद से निषादी द्वारा उत्पन्न संतान पांच पीढ़ी के पश्चात शूद्रत्व से मुक्त हो जाती है या कोई इसे छठी पीढ़ी तक ले जा सकता है। मद्रास की एक नई पांडुलिपि में बौद्धायन के संबंध में लिखा है कि बौद्धायन ने ब्राह्मण पुरुष और शूद्र स्त्री से उत्पन्न संतानों को आर्यों की श्रेणी में पहुंचाने की आज्ञा दी है। यह असंभव नहीं होगा कि मनुस्मृति के श्लोक का अर्थ यह भी हो सकता है। यदि ब्राह्मण पुरुष और शूद्र स्त्री से संतान उत्पन्न होती है तो वह श्रेष्ठ ब्राह्मण पुरुष और पारशव स्त्री निम्न जाति सातवीं पीढ़ी में उच्च जाति में पहुंच जाती है।’’

व्याख्या कोई भी हो किंतु तथ्य फिर भी स्पष्ट है कि सातवीं पीढ़ी ख्2, में शूद्र परिस्थिति विशेष में ब्राह्मण हो सकता था। शूद्र यदि आर्य नहीं होते तो इस प्रकार की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार शूद्र अनार्य नहीं थे। कौटिल्य का अर्थ शास्त्र इस संबंध में महत्वपूर्ण साक्ष्य है। इस प्रथा का उन्मूलन करते हुए कौटिल्य कहता है ख्3, ः-

‘‘यदि कोई संबंधी किसी शूद्र को बेच दे या बंधक रख दे जो जन्मजात दास न

  1. अध्याय 10, मंत्र 64-76

  2. ऐसा प्रतीत होता है कि 6 पीढि़यां गिन कर कुल निर्धारण की यही परंपरा प्राचीन काल में सार्व भौम

हो गई थी - डब्ल्यू. ई. हर्न आर्यन हाउस होल्ड-8

  1. ग्रंथ 3, अध्याय 13