96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
रहा हो और वयस्क न हो गया हो और जन्म से आर्य हो तो विक्रेता संबंधी को बारह पण अर्थदंड देना होगा। किसी दास के आर्थिक धोखाधड़ी करने पर या आर्य (आर्यभव) के रूप में अधिकार न देने पर आशा आर्थिक दंड (किसी आर्य को गुलाम बनाने पर दिए जाने वाले दंड की अपेक्षा) देना होगा।
उपर्युक्त राशि पा जाने के पश्चात भी यदि कोई दास को मुक्त न करे तो उसको
बारह पण अर्थ दंड देना होगा। अकारण किसी को बंदी बनाए रखने पर (सम्रोधास
चकरामत) भी वही दंड देना होगा।’’
यदि किसी ने अपने को दास के रूप में बेच दिया हो तो उसकी संतान आर्य
मानी जाएगी। दास ने अपने स्वामी के कार्य में सहयोगी बन कर जितना धन अर्जित
किया है वह सब उसके उत्तराधिकारी को दिया जाए।’’
इस प्रकार कौटिल्य (चाणक्य) ने अपने अर्थशास्त्र में शूद्रों को स्पष्ट रूप से आर्य घोषित किया है।
V
यह कहना असत्य नहीं तो व्यर्थ अवश्य है कि आर्यों द्वारा दास बनाए गए लोग ही शूद्र कहलाएं। इस संबंध में दो तर्क दिए जाते हैं। प्रथम तो ऋग्वेद में दासों को गुलाम दस्यु बताया गया है और दूसरा यह कि दास और शूद्र एक ही हैं।
यह सत्य है कि ऋग्वेद में शूद्र का दस्यु या सेवक के अर्थ में उल्लेख हुआ है। किंतु इस शब्द का इस अर्थ में प्रयोग केवल पांच बार हुआ है। इससे अधिक नहीं। साथ ही यदि यह पांच बार से अधिक प्रयुक्त भी हुआ तो क्या इससे यह सिद्ध होता है कि शूद्र ही दास बनाए गए? जब तक यह सिद्ध नहीं होता कि ये तीनों (शूद्र और दास) एक ही थे तब तक ऐसा निर्णय करना कि शूद्र दास बनाए गए, मूर्खता होगी। यह ज्ञात तथ्यों के विरुद्ध भी होगी।
शूद्र क्षत्रिय राजाओं के राज्याभिषेक में सम्मिलित होते थे। उत्तरकालीन वैदिक ब्राह्मण काल में राजतिलक में जनता सम्राट को मुकुट धारण कराती थी, जो वास्तव में राजा को प्रभुत्व प्रदान करता था। प्रजा के प्रतिनिधियों को ‘‘रत्नी’’ कहा जाता था क्योंकि उनके पास रत्न होते थे। राजा को प्रभुत्व तभी प्राप्त हो पाता था जब उसे प्रभुत्व के प्रतीक रत्न प्राप्त हो जाते थे। इसके पश्चात राजा प्रत्येक रत्नी के निवास स्थान पर जाकर उपहार देता था। यह उल्लेखनीय है कि इन रत्नियों में अनिवार्य रूप से एक ख्1, शूद्र होता था।
‘‘नीति मयूख’’ के रचियता नीलकंठ ने बाद के राज्याभिषेक का वर्णन किया है।
- जायसवाल, हिंदू पोलिटी (1943) पृष्ठ 200-201