अध्याय 6. शूद्र और दास - Page 112

शूद्र और दास

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इसके अनुसार चार वर्णों के मंत्री (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र) नये राजा को राजमुकुट धारण कराते थे। तत्पश्चात सभी वर्णों और जातियों के लोग राजा के ऊपर पवित्र जल का अभिषेक करते और द्विज ख्1, जय जयकार करते थे।

महाभारत में यह प्रमाण मिलता है कि युधिष्ठिर के राजतिलक समारोह में ब्राह्मणों के साथ शूद्र भी आमंत्रित किए गए थे। ख्2,

प्राचीन काल में जनपद और पौर नामक दो परिषदें होती थीं। इनमें शूद्र प्रतिनिधियों का ब्राह्मण ख्3, भी विशेष रूप से सम्मान करते थे।

मनुस्मृति के अध्याय 4 श्लोक 61 तथा विष्णुस्मृति (21,64) के उस आदेश से कि ब्राह्मण शूद्र द्वारा शासित राज्य मेंं न रहे यह प्रमाणित हो जाता है कि शूद्र भी राजा होते थे। अन्यथा मनु का यह आदेश देना निरर्थक था।

महाभारत ख्4, के शांतिपर्व में भीष्म ने (जो प्रत्येक जाति और वर्ण के प्रतिनिधित्व में विश्वास करते थे) युधिष्ठिर को यह राजनैतिक उपदेश दिया हैः-

‘‘राजा को चाहिए कि वेद विद्या के विद्वान निर्भीक, अंदर बाहर से स्नातक, चार ब्राह्मण, बलवान शस्त्रधारी आठ, क्षत्रिय, धन धान्य से संपन्न इक्कीस वैश्य, पवित्र आचरण वाले विनयशील तीन शूद्र, पौराणिक ज्ञान संपन्न आठ गुणों से युक्त एक सूत इन सबको मंत्रिमंडल में सम्मिलित करें।’’

इससे सिद्ध होता है कि शूद्र मंत्री होते थे, और ब्राह्मणों की संख्या के बराबर ही प्रतिनिधित्व प्राप्त ख्5, होते थे।

शूद्र नीच और दरिद्र नहीं होते थे। वे धनी होते थे। यह तथ्य मैत्रयानी संहिता (4-2-7-10) और पंचविश ब्राह्मण (1.11) से सिद्ध होता है। ख्6,

इस प्रश्न के दो पहलू और है। यदि यह मान लिया जाए कि शूद्रों को दास बनाया गया तो प्रश्न उठता है कि शूद्रों को दास बनाने का क्या तात्पर्य था? यदि आर्यों को दास बनाने का ज्ञान पूर्वकाल में न होता या वे आर्यों को दास बनाने के लिए तैयार न होते तभी उनका अभिप्रायः स्पष्ट होता। किंतु तथ्य यह है कि आर्यों को दास बनाने का ज्ञान था और उन्होंने आर्यों में से भी दास बनाए। ऋग्वेद (7.86.7), (8.19.36) और (8.66.3) में स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं कि आर्यों ने अपने लोगों को भी दास बनाया।

  1. जायसवाल, हिंदू पोलिटी (1943) पृष्ठ 223

  2. महाभारत सभा पवे अघ्याय 33, श्लोक 41-42

  3. जायसवाल, हिंदू पोलिटी पृष्ठ 248

  4. राय का अनुवाद, खंड 2 197(2.7.10)

  5. मेंत्रेयी सहिता, खंड 2, श्लोक 7-10 तथा पंचविंश ब्राह्मण, अध्याय 6, श्लोक 1-11

  6. देखें वैदिक इंडैक्स खंड II पृष्ठ 390