अध्याय 6. शूद्र और दास - Page 113

98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

फिर प्रश्न उत्पन्न होता है कि उन्होंने विशेष रूप से शूद्रों को दास क्यों बनाया? इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि शूद्र दासों के लिए उन्होंने पृथक विधानों की रचना क्यों की?

निष्कर्ष यह है कि पाश्चात्य विचारक हमारे प्रश्नों का उत्तर देने में सहायक नहीं हैं अथवा असमर्थ हैं कि शूद्र कौन थे और वे भारतीय आर्यों के समुदाय में चतुर्थ वर्ण कैसे बनें?