अध्याय 7. शूद्र कौन थे - क्या शूद्र क्षत्रिय थे? - Page 115

100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

संयोजन एक विख्यात अंग्रेज प्राच्य विद ने किया। पूरे भारत से पांडुलिपियां मंगाई गईं (दक्षिण सहित) और उनका ध्यानपूर्ण मिलान किया गया। वैसे इनका सावधानी से संपादन किया गया, लेकिन मैंने सोसायटी के संस्करण में उपलब्ध उसकी हू-ब-हू नकल नहीं की। मैंने ध्यानपूर्वक इसका मिलान महाराज वर्दवान के बंगाली चरित्र से किया जिसका बहुत ध्यानपूर्वक संपादन किया गया था। भारत के विभिन्न भागों से 18 पांडुलिपियां मंगाई गई (दक्षिण सहित) वर्दवान के पंडि़तों द्वारा उनका ध्यानपूर्वक मिलान किया गया। उन्हें एक श्लोक वास्तविक लगा।’’

महाभारत के समीक्षात्मक संस्करण के बहुश्रुत संपादक प्रो. सुकथानकार ने महाभारत के विभिन्न संस्करणों का निरूपण करके निष्कर्ष निकाला है। उनका कथन है ख्1, ःµ

‘‘द एडिशियो प्रिंसेप (कलकत्ता 1856) एक शताब्दि के बाद भी इसकी सत्यता असंदिग्ध है।’’

यदि कोई समालोचक यह कहे वह विषय वस्तु के साक्ष्य के रूप में पांडुलिपि देखना चाहता है जिसके आधार पर शूद्रों की उत्पत्ति निर्धारित की गई है तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। ऐसा परीक्षण करने के लिए दो बातें आवश्यक हैं। पहली ख्2, यह है कि महाभारत के सभी 18 पर्वो की कोई अकेली संपूर्ण पांडुलिपि नहीं है। प्रत्येक पर्व प्रथक है, परिणामतः प्रत्येक पर्व में भारी अंतर मिलेगा। इसलिए हर पर्व की जितनी पांडुलिपियों को देखा जाए तो यह कहना कठिन होगा कि किसे आधार माना जाए।

ध्यान देने की दूसरी ख्3, बात यह है कि महाभारत के अलग-अलग दो रूप हैं उत्तरात्य और दक्षिणात्य जो आर्यवर्त की उत्तरापथ और दक्षिणापथ की अलग-अलग विशेषताएं लिए हैं।

स्वाभाविक है कि पांडुलिपियों का परीक्षण बहुत सी पांडुलिपियों के उपलब्ध होने पर ही किया जाता है, साथ ही उनका वर्गीकरण दक्षिणात्य और उत्तरात्य के रूप में कर लिया जाए। इन बातों को ध्यान में रखते हुए महाभारत के शांतिपर्व के अध्याय 60 के श्लोक 38 का भी विभिन्न पांडुलिपियों मेंं पाठान्तर इस प्रकार है ख्4, ःµ

  1. शूद्रः पैजवनो नाम (कुंभ कोणम) दक्षिणात्य

  2. शूद्रः पैलवनो नाम (एम/1ः एम 2) दक्षिणात्य

  3. सुकथानकार मेमोरियल एडीसन खंड 1, पृष्ठ 131

  4. सुकथानकार ओ. सिटेशन पृष्ठ 14

  5. वही, पृष्ठ 42

  6. कोष्ठकों में दिए गए अक्षर संरक्त संस्थान द्वारा पांडुलिपियों को दी गई संख्या को दर्शाते हैं। ‘एन’

अथवा ‘एम’ उत्तरात्य अथवा दक्षिणात्य को इंगित करते हैं। ‘क’ कुम्भकोणम के लिए हैं। (मैं भंडारकर

के संस्थान का आभारी हूं जिन्होंने मिलान सूची उपलब्ध कराई।)