अध्याय 7. शूद्र कौन थे - क्या शूद्र क्षत्रिय थे? - Page 117

102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

से ‘‘पुरा’’ तक का परिवर्तन मात्र संयोग न होकर जान-बूझकर किया गया मालूम

होता है। इसकी पृष्ठभूमि में क्या कारण थे, यह कहना कठिन है। फिर भी इससे

दो बातें साफ हैंःµ

  1. यह परिवर्तन स्वाभाविक जैसा है, तथा

  2. यह ‘‘शूद्र’’, ‘‘पैजवन’’ के विपरीत नहीं जाता।

उपरोक्त निष्कर्ष श्लोक 38-40 के पहले वाले श्लोकों के संदर्भ पर आधारित है। देखिएःµ

‘‘स्वामी चाहे किसी भी संकट या विपत्ति में हो, शूद्र को उसका साथ नहीं छोड़ना चाहिए। स्वामी के निर्धन होने पर शूद्र को उसकी सेवा और भी अधिक लगन से करनी चाहिए।

शूद्र की अपनी कोई संपत्ति नहीं होती। उसके पास जो कुछ भी है, उसके स्वामी का है।

यज्ञ अन्य तीन वर्णों के लिए विहित है। शूद्र भी यज्ञ कर सकता है लेकिन वह स्वाहा, स्वधा अथवा अन्य मंत्रों का उच्चारण नहीं कर सकता। वह पाक यज्ञ से देव पूजा कर सकता है। ऐसे यज्ञ की दक्षिणा का पूर्ण पात्र है।’’

पूर्ववर्ती श्लोकों के संदर्भ में श्लोक संख्या 38 से 40 का अध्ययन करने पर यह पता चलता है कि पूरा प्रसंग ही शूद्रों के विषय में है। पैजवन की कथा तो एक दृष्टांत ही है। अतः पैजवन के नाम के पहले ‘‘शूद्र’’ शब्द का प्रयोग अनावश्यक है। इस प्रसंग से अवगत रह कर ही लेखक से पहले ‘‘शूद्र’’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है और उसके प्राचीनकाल में होने के कारण ‘‘पुरा’’ लिख दिया है और यह स्वाभाविक भी है।

उक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि महाभारत के शांतिपर्व में चर्चित व्यक्ति पैजवन था और वह शूद्र था।

II

दूसरा प्रश्न है कि पैजवन कौन था? यास्क निरूक्त में इसका संकेत मिलता है। निरूक्त (1.24. ख्1, ) में यास्क कहता हैःµ

सबके मित्र ऋषि विश्वामित्र पैजवन के पुत्र सुदास के पुरोहित थे। सुदास महादानी था। पिजवन का पुत्र पैजवन था। पिजवन अर्थात उसकी गति अनुक्रमणीय थी।

शूद्र कौन थे - क्या शूद्र क्षत्रिय थे?

यास्क निरूक्त से दो महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट हुईःµ

  1. लक्ष्मण स्वरूप निघंटु और निरूक्त पृष्ठ 35-36