शूद्र कौन थे-क्या शूद्र क्षत्रिय थे?
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निमित्त इंद्र को आहूत किया। इंद्र ने त्वरित गति से वयत् के पुत्र पाशधुम्न के भाग
का सोम वशिष्ठों पर उंडेल दिया।’’
- सुदास ने उसी प्रकार त्वरित गति से सिंधु नदी को पार कर अपने शत्रुओं का दमन
किया। उसी प्रकार वशिष्ठों ने अपनी स्तुति से इंद्र को दस राजाओं से सुदास की
रक्षा करने के लिए तैयार कर लिया।
‘‘प्यास से व्याकुल वर्ध के लिए प्रार्थना करते हुए दशराजन से युद्ध में त्रित्सुओं द्वारा सहायता प्राप्त वशिष्ट ने इंद्र को सूर्य की भांति जाज्वल्यमान बना दिया। इंद्र ने वशिष्ठ की प्रार्थना सुनी और त्रित्सुओं को विशाल भू-भाग प्रदान किया।’’
सूक्त 19 में बताया गया हैः
- ‘‘हे इंद्र, तुमने नैवेद्य अर्पित करने वाले सुदास की हर प्रकार से रक्षा की है। तुमने
पुरूकुत्स के पुत्र त्रिसदस्यू और पुरू को धरा पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए
युद्ध में शत्रुओं से बचाया है।’’
- ‘‘हे इंद्र, दानी सुदास पर तुम्हारी अनन्त कृपाएं हैं। मैं तुम्हारे दो शक्तिशाली अश्व
जोतता हूं। हमारी स्तुति आप आराध्यों तक पहुंचे’’।
सातवें मंडल के सूक्त 18 में कहा गया हैः
- ‘‘स्तवनीय इंद्र ने यरूठणी नदी के गहरे जल को सुदास के लिए तलस्पर्श और पार
करने योग्य बना दिया। स्तोता के लिए नदियों के तरंगायित और अवरोधक शाम को
दूर किया।’’
- ‘‘जल में मछली कीटरद वंधे रहने वाला तुर्वश धन के लिए सुदास के पास गया
किंतु मछली की तरह तड़पता रहा और तब भृगुओं तथा द्रहनुओं ने उसका सुदास
से साक्षात्कार करा दिया। इन दोनों ने समस्त पृथ्वी का विवरण किया। सुदास के
मित्र, इंद्र ने इससे सुदास की रक्षा की।’’
- ‘‘हव्यों के पाचक, कल्याण -मुख, तपस्या से अप्रवृद्ध विषाण हस्त और मंगलकारी
व्यक्तियों ने इंद्र की स्तुति की। इंद्र ने आर्य को गायों को गो-तस्करों से छुड़ाया
और शत्रुओं को मारा।’’
- ‘‘दुष्ट मानस और मंदमति शत्रुओं ने परूष्णी नदी को खोदते हुए उसके दोनों तटों
को गिरा दिया। किंतु इंद्र की कृपा से सुदास विश्वव्यापी हो गए और सुदास ने
चममान के पुत्र कवि को मार दिया।’’
- ‘‘परूष्णी नदी का जल सामान्य रूप से गंतव्य धारा में बहने लगा। सुदास राजा का
घोड़ा भी अपने गंतव्य स्थान को चला गया। इंद्र ने सुदास के अनेक शत्रुओं को
पराजित किया।’’