अध्याय 7. शूद्र कौन थे - क्या शूद्र क्षत्रिय थे? - Page 125

110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

  1. ‘‘विभिन्न रंगों वाले पशुओं पर आरूढ़ मरूद्रगणों को अपनी पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार

उनकी माता पृश्णी ने इंद्र के पास भेजा। मरूदुगण इंद्र के पास उसी त्वरित गति

से गए जैसे चरवाहे बिना गायें जौ की ओर जाती हैं। मरूतों के नियुत नामक घोड़े

की उन्हें वहां तेजी से ले गए।’’

  1. ‘‘इंद्र ने मरूदुगण की उत्पत्ति राजा की सहायता के लिए की। यशाकांक्षी राजा ने

पुरष्णी नदी के तट पर 21 मानवों की बलि दी।’’

  1. ‘‘हे इंद्र तेरे भय से श्रुत कवश वृद्ध और द्रहयूस नदी में बह गए। जिन लोगों ने

आपकी स्तुति की और आपकी मित्रता मानी वे समृद्ध हो गए।’’

  1. ‘‘शक्तिपुज इंद्र ने त्वरित गति से उनके सात (7) अजेय नगर ध्वस्त कर दिए।

उसने अनु के पुत्र का निवास स्थान छीन कर त्रित्सु की भेंट कर दिया। हम इंद्र

की कृपा से दुर्भार्षी लोगों पर विजय प्राप्त करें।’’

  1. ‘‘छियासठ हजार छः सौ साठ अनु तथा द्रहयुस यौद्धा महान सुदास के पशुओं का

हरण करना चाहते हैं, इंद्र के गौरवशाली कृत्य से विनाश को प्राप्त हुए।’’

  1. ‘‘उद्धत प्रित्सु भूलवश इंद्र से उलझ तो पड़े लेकिन बाद में सारी संपत्ति सुदास के

लिए छोड़ कर नदी की तीव्र धारा की भांति भाग गए।’’

  1. ‘‘इंद्र ने अपने वरिष्ठ सुदास के शत्रुओं को तहस नहस कर दिया। इंद्र ने सुदास के

शत्रु जनों को भड़का कर सुदास के विरुद्ध खड़ा कर उन्हें भागने को मजबूर कर

दिया।’’

  1. ‘‘इंद्र ने अकिंचन के दान को पूरा किया, बकरी से सिंह का वध कराया, सूई की

नोक से बलि खंभे को कोण काटा और शत्रुओं की लूट से प्राप्त धन संपदा सुदास

को सौंपी।’’

  1. ‘‘हे इंद्र, उपद्रवी भेद ने अपने असंख्य शत्रुओं को दास बना लिया है। वह तुम्हें क्रूर

कहने वालों को संरक्षण देता है। इस पर व्रज प्रहार करो।’’

  1. ‘‘यमुना तट के निवासियों और त्रित्सुओं ने युद्ध में मेद का वध करने पर इंद्र की

अभ्यर्थना की। अज, शिग्रु और यक्ष लोगों ने इंद्र के निमित्त यज्ञ किया और अश्वों

के सिर की बलि दी।

  1. ‘‘इंद्र तेरी सेना और समृद्धि अथाह है। पुरातन और नूतन की गणना उसी प्रकार

असंभव है जैसे प्रति प्रभाव की गणना। तूने मन्यमान के पुत्र देवक का हनन किया

और शाम्बर को पर्वत से नीचे धकेला है।’’