अध्याय 7. शूद्र कौन थे - क्या शूद्र क्षत्रिय थे? - Page 127

112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

(छः) ब्राह्मणों के लिए अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध सुदास अतिथिग्य के

नाम से पुकारा जाता था। दानशीलता के कारण ब्राह्मण उसका यशोगान

कैसे करते थे, ऋग्वेद मेंं देखिएःµ

47.6ः- ‘‘हे अश्विन अपने रथ में भर कर सुदास को धन दो, सागर अथवा आकाश

के मार्ग से धन भेजो जिससे हमें अपार दक्षिणा मिले।’’ 63.7ः- ‘‘पुरूकुत्स के सात नगरों के विध्वंसक सुदास के विपत्ति निवारक इंद्र,

अब पुरू पर द्रव्य वर्षा करो।’’

1.112.19 - ‘‘हे अश्विन सुदास को तेज और बल प्रदान करने वाली शक्ति के साथ

पधारो।’’

7.19.3ः- ‘‘हे इंद्र, सुदास की स्तुति पर तुमने हर प्रकार की सहायता देकर उसकी

रक्षा की। तुमने पुरूकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु को बचाया और पुरू की अपने

शत्रुओं के वध में तुमने भरसक सहायता की।’’

7.20.2ः- ‘‘वृत्र संहारक, इंद्र अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, सुदास को स्थान (सम्मान)

देते हैं तथा अपने भक्तों को धन देते हैं।’’

7.25.3ः- ‘‘सुदास को सौ बार सहायता दो। एक सहस्र मनोवांछित उपहार दो, समृद्धि

प्रदान करो। विनाशक शस्त्रों का नाश करो। हमें यश और धन दो।’’ 7.32.10ः- ‘‘इंद्र और मारूतों से रक्षित सुदास के रथ को रोकने की शक्ति किसी में

नहीं है। वह पशुओं से भरे चरागह में निर्द्वद्व विचरण करता है।’’ 7.53.3ः- ‘‘हे आकाश और वसुंधरा, सुदास को अथाह धन का उपहार दें।’’ 7.60.8ः- आदिति, मित्र और वरूण सुदास को सुरक्षा प्रदान करते हैं, अस्तु हे

आराध्यगण, हम देवताओं के प्रति कोई अपराध न करें। हे आर्यमाण, हमें

हमारे शत्रुओं से मुक्ति दिलाओ। हे बलशाली देवजन, सुदास को विस्तृत

प्रसाद प्रदान करो।

ये ऋग्वेद से संकलित और महाभारत के शांतिपर्व में वर्णित पैजवन के जीवन वृत्त के अंश है।। ऋग्वेद से हमेंं यह ज्ञात होता है कि उसका वास्तविक नाम सुदास था। महाभारत में उसे शूद्र बताया गया है जो एकदम नई बात है। शूद्र का आर्य होना, शूद्र का क्षत्रिय होना और शूद्र का राजा होना। इससे अधिक विस्मयजनक क्रांतिकारी बात और क्या हो सकती है?

जीवन वृत्त की खोज को समाप्त करने से पूर्व तीन महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक हैःµ

  1. क्या सुदास आर्य था?

  2. यदि सुदास आर्य था तो उसकी जाति क्या थी?

  3. यदि सुदास शूद्र था तो शूद्र का क्या अर्थ है?