114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
अतः वे यह मानते हैं कि दुष्यंत पुत्र भरत के नाम पर ही इसका नाम भारत पड़ा।
दो भरत जातियां एक दूसरे से भिन्न हैं। एक तो दुष्यंत पुत्र भरत है जिसका वर्णन महाभारत में आता है और दूसरे भरत ऋग्वेद में वर्णित मनु के वंशज हैं, जिनमें सुदास भी है। इस देश का नाम ऋग्वेद के भरतों के नाम पर ही भारत पड़ा न कि दुष्यंत के भरत के नाम पर। यह भगवत पुराण में स्पष्ट किया ख्1, हैःµ
प्रियंवदो नाम सुतो मनोः स्वायंभुवतस्य ह।
तस्याग्रीध्रस्ततो नाभिऋषभश्च सुतस्ततः।।
अवतीर्ण पुत्रशतं तस्यासी द्रहयपारगम्।
तेषां वे भरतों ज्येष्ठों नारायणपरायणः।
विख्यातं वर्षमेतद्यन्नाम्ना भारतमुत्तप्रम्।।
अर्थातः ‘‘स्वयंभु के पुत्र मनु के एक पुत्र प्रियंवद थे। उनके पुत्र अग्नीध हुए। अग्नीध के पुत्र नाभि और नाभि के पुत्र ऋषभ हुए। ऋषभ के एक और वेद विद पुत्र हुए जिनमें नारायण के परम भक्त भरत ज्येष्ठ थे। उन्हीं के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।’’
उपरोक्त से पता चलता है कि सुदास किन प्रतापी राजाओं का वंशज था।
अब यह पता करना है कि सुदास आर्य था अथवा नहीं। भरत आर्य थे, अस्तु सुदास भी आर्य ही होगा।
ऋग्वेद के मंत्र 7.18.7. से सुदास के आर्य होने में संदेह उत्पन्न होता है। क्योंकि इससे ऐसा प्रतीत होता है कि त्रित्सु आर्य नहीं थे। उनके अनुसार इंद्र ने त्रित्सुओं से आर्यों की गायों को छुड़ाया और त्रिस्तुओं को मार कर आर्यों की रक्षा की। अतः त्रित्सु आर्यों के शत्रु थे। त्रित्सुओं को अनार्य कहे जाने पर ग्रिफिथ महाशय भी चक्कर में पड़ गए। वह उक्त मंत्र के शाब्दिक अर्थ के कारण हुआ क्योंकि वह भूल गए कि ऋग्वेद में धर्म एवं जाति के आधार पर दो भिन्न आर्य जातियों का वर्णन है। तथ्यों के प्रकाश में ऐसा प्रतीत होता है कि इस मंत्र की रचना के समय त्रित्सु और आर्य धर्म के आधार पर एक नहीं हो पाए थे। फिर भी इसका यह आशय कदापि नहीं कि ये आर्य नहीं थे। वे आर्य थे। यह भी निर्विवाद सिद्ध है कि त्रिस्तु आर्य थे। सुदास भरत रहा हो या त्रित्सु वह आर्य था।
अंतिम प्रश्न है ‘‘शूद्र’’ का क्या अर्थ है। सुदास के शूद्र सिद्ध हो जाने से शब्द का अर्थ बदल गया है। पूर्व के गवेषकों के लिए यह नई खोज आश्चर्यजनक है क्योंकि वे
- वैद्य महाभारत उपसंहार पृष्ठ 200 से उद्धत।