118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
का उल्लेख है। शूद्रों के पृथक वर्ण का कोई जिक्र नहीं है।
शतपथ ब्राह्मण (2.1.4.11) में कहा ख्1, है - भूः कह कर प्रजापति ने पृथ्वी को बनाया, भुवः कह कर वायु और स्वः वे आकाश को बनाया। ये तीनों शब्द और ब्रह्मांड एक साथ ही बने। तीनों के साथ अग्नि को बनाया। भूः उच्चारण करके ब्राह्मण को बनाया, भुवः कह कर क्षत्रिय को और स्वः से वैश्य को बनाया। सबके साथ अग्नि को बनाया, भूः कह कर प्रजापति ने स्वयं को बनाया, भुवः से प्राणियों को और स्वः से पशुओं को बनाया। दुनिया प्रजापति, प्राणि और पशुओं की है और अग्नि तीनों की है।
तैत्तिरीय ब्राह्मण (3.12.9.2) में लिखा ख्2, हैःµ
‘‘सारी सृष्टि ब्रह्मा से पैदा हुई। ऋग्वेद वे वैश्व बने, ऋग्वेश से क्षत्रिय और सामवेद से ब्राह्मण पैदा हुए। ऐसा प्राचीन समय में कहा गया है।’’
ऋग्वेद और दोनों ब्राह्मण ग्रंथों से बढ़कर क्या प्रमाण हो सकता है। जिनकी मान्यता वेदवत है दोनों श्रुति हैं। दोनों में केवल तीन वर्णों का उल्लेख है। शूद्र का पृथक वर्ण होना अथवा चतुर्थ वर्ण होने का कोई कथन नहीं है। मेरे कथन पर इससे बढ़कर कोई प्रमाण नहीं हो सकता कि मूलतः तीन ही वर्ण थे।
II
मेरा ऐसा प्रमाण है। लेकिन इसके प्रतिकूल पुरुष सूक्त है जिसमें कहा गया है कि चार वर्णों का आदिकाल से अस्तित्व है। किसे सही मानें? मीमंसा के सिद्धांतों के अनुसार तो पुरुष सूक्त के चार वर्ण और उक्त ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ण के सिद्धांत दोनों को मानना पड़ेगा। परंतु यह अनुचित बात है। वर्ण तीन भी हैं और चार भी, ऐसा कहने का कोई अर्थ नहीं है। अतएव इतिहासकारों के मत को मानना पड़ेगा कि कौन पहले बना? क्या पुरुष सूक्त असली ऋग्वेद के बाद बना? इसके लिए पुरुष सूक्त तथा बाकी ऋग्वेद की भाषा का मिलान करना पड़ेगा। सभी विद्वानों का मत है कि पुरुष सूक्त बाद का बना है।
कोलब्रुक का कथन ख्3, हैः- ‘‘यह मंत्र अर्थात पुरुष सूक्त के छंद तथा शैली और भाषा शेष ऋग्वेद की प्रार्थनाओं से सर्वथा भिन्न है। यह अधिक अर्वाचीन प्रतीत होता है। यह उस समय बना होगा जब कि संस्कृत भाषा और व्याकरण काफी परिष्कृत हो गई। इसकी भाषा से यही पता चलता है कि पहले अधिकांश मंत्र सहज लोग भाषा में लिखे गए और वेदों का वर्तमान संकलन उस समय का है जब छंदों का प्रयोग होने लगा और पुराणों तथा काव्यों में गेय मंत्र का श्लोक लिखे जाने लगे।’’
म्यूर खंड 1, पृ. 17
म्यूर खंड द्वारा उद्धत खंड 1, पृ. 17
म्यूर खंड 1, पृ. 13