वर्ण तीन हैं या चार?
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प्रो. मेक्समूलर का मत ख्1, हैः- ‘‘इसमें संदेह की गुंजायश नहीं है। उदाहरणार्थ नौवें मंडल का 90वां मंत्र लक्षण और शैली की दृष्टि से अर्वाचीन है। इसमें यज्ञ के कर्मकांड की संपूर्ण झलक है, इसमें तकनीकी दार्शनिक शब्दावलि है, इसमें तीन ऋतुओं का क्रम इस प्रकार है वसंत, ग्रीष्म और शरद। ऋग्वेद का मात्र यही प्रसंग है जहां चार वर्ण गिनाए गए हैं। इस संकलन के अर्वाचीन होने की सशक्त संभावनाएं है। उदाहरणार्थ ग्रीष्म का ऋग्वेद में अन्यत्र उल्लेख नहीं है। प्राचीन वैदिक मंत्रों में वसंत शब्द भी नहीं मिलता। ऋग्वेद (10.161.4) में इसकी एक बार आवृत्ति है, जहां तीन ऋतुएं शरद, हेमंत और वसंत ही कही गई हैं।’’
प्रोफेसर वेबर का कहना ख्2, हैः- ‘‘पुरुष सूक्त ऋग्वेद के मंत्रों में सबसे बाद का जुड़ा प्रतीत होता है। यह उसकी सामग्री से स्पष्ट है। फिर साम संहिता में इससे कोई मंत्र नहीं लिया गया। यह भी एक प्रमाण है। नवगेय सिद्धांत में यद्यपि निश्चयात्मक रूप से नहीं, फिर भी उसने पहली अर्चिका के सातवें प्रपाथक में पहले पांच मंत्र ही लिए हैं। यह एक विशिष्टता है।’’
III
यह एक तर्क है जो हमें यह निर्णय लेने में मदद करता है कि पुरुष सूक्त बाद में बना या पहले। इसके लिए यह देखना जरूरी होगा कि वेदों की कितनी संहिताओं ने पुरुष सूक्त को अपनाया है। अध्ययन करने पर वेद और संहिताओं की स्थिति इस प्रकार हैःµ
इसके सामवेद में केवल 5 मंत्र हैं। श्वेत यजुर्वेद और यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता में पुरुष सूक्त के मंत्र हैं परंतु दोनों में बहुत अंतर है। ऋग्वेद में पुरुष सूक्त के केवल 16 मंत्र है परंतु वाजसनेयी संहिता में 22 मंत्र हैं। कृष्ण यजुर्वेद की तीन संहिताएं तैत्तिरीय, कठ और मैत्रायनी में से किसी में भी पुरुष सूक्त नहीं है। केवल अथर्ववेद में ही पुरुष सूक्त ज्यों का त्यों शामिल किया गया है।
भिन्न-भिन्न वेदों में पुरुष सूक्त के मंत्रों की संख्या, क्रम और पाठ तीनों क्रम से नहीं है, वाजसनेयी संहिता में अंतिम 6 मंत्र अधिक हैं। ऋग्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद में नहीं पाए जाते। इसी प्रकार अथर्ववेद के सूक्त का 16वां मंत्र न ऋग्वेद में पाया जाता है, न यजुर्वेद में। पन्द्रह मंत्र भी तीनों वेदों में समान नहीं है और न ही उनका क्रम एक समान है। यह भिन्नता निम्नलिखित सूची से प्रकट होगी। इस सूची में इस चिह्न ( x ) का तात्पर्य है, नहीं पाए जाते और चिह्न ($) का अर्थ है, पाठांतर है। देखिएःµ
म्यूर खंड 1. पृ. 12
म्यूर खंड 1, पृ. 14