अध्याय 8. वर्ण तीन हैं या चार? - Page 136

वर्ण तीन हैं या चार?

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विभिन्न वेदों में पुरुष सूक्त का स्थान अलग-अलग है। ऋग्वेद में यह विविध रूप में दिया गया है। ऋग्वेद में यह पूरक परिशिष्ट है। इसमें भेद क्यों है?

अस्तु इस गड़बड़ का परिणाम यह निकलता है किःµ

  1. चूंकि पुरुष सूक्त कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता, कठ और मंत्रायनी संहिता में

नहीं पाया जाता, इससे यह सिद्ध है कि इन संहिताओं के बाद यह सूक्त ऋग्वेद में

जोड़ा गया।

  1. चूंकि यह ऋग्वेद तथा युजर्वेद की परिशिष्ठ भाग में डाला गया है, इससे इस सिद्ध

होता है कि यह इसके बाद बना।

  1. चूंकि और वेदों के सूक्तों में मनमानी कांट-छांट और पाठांतर किया गया है, इससे

सिद्ध होता है कि यह प्राचीन मंत्र नहीं था और न ही इसकी उतनी प्रतिष्ठा थी।

इन बातों से साझा साक्ष्य मिलते हैं जो प्रो. मैक्समूलर और अन्य विद्वानों के पक्ष में

जाते है कि पुरुष सूक्त क्षेपक है।

IV

पुरुष सूक्त के मंत्रों की रचना शैली में भी अंतर है। सब मंत्र तो एक सिलसिले में है परंतु मंत्र 11 और 12 प्रश्नोत्तर के रूप में है। ये दो मंत्र वर्णोत्पत्ति को बताते हैं। एक व्याख्यात्मक क्रम में यह व्यवधान क्यों आया। ऐसा प्रतीत होता है कि वे दो मंत्र बाद में सूक्त के बीच जोड़ दिए गए। अतएव केवल पुरुष सूक्त बाद में ही नहीं जोड़ा गया। उसमें समय-समय पर और मंत्र भी जुड़ते रहे। कुछ विद्वानों का तो यह भी मत है कि पुरुष सूक्त तो क्षेपक है ही उसके कुछ मंत्र और भी बाद में इसमें जोड़े गए।

कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि पुरुष सूक्त प्रपंच है, जाली है और ब्राह्मणों ने अपनी श्रेष्ठता को बघारने के लिए इसमें जोड़े हैं। पुरोहितों ने कई जालसाजियों की हैं।

ऐसे प्रपंच ब्राह्मणों ने बहुधा रचे हैं। प्रोफेसर मैक्समूलर का कथन है कि ऋग्वेद में ‘‘अग्रे’’ का ‘‘अग्ने’’ बना दिया गया, जिससे विधवाओं के जलाने का अर्थ निकलने लगा। ईस्ट इंडिया कंपनी के समय में एक अभियोग में वादी के समर्थन में एक स्मृति ही रच दी गई। इसलिए कोई विस्मय नहीं कि 11वें और 12वें मंत्र रच कर जोड़े दिए गए और बाद में चौथा वर्ण टपक पड़ा और वेद में चातुर्वर्ण्य की प्रतिस्थापना हो गई।

V

क्या पुरुष सूक्त ब्राह्मण ग्रंथों के पहले बने? यदि पुरुष सूक्त ऋग्वेद का भाग है तो यह ब्राह्मणों से पहले बना होना चाहिए। यदि ऋग्वेद ब्राह्मण ग्रंथों से पहला है तो पुरुष