अध्याय 8. वर्ण तीन हैं या चार? - Page 137

122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

सूक्त भी पहले का ही होना चाहिए। अतएव इसका भी अलग से अनुसंधान उचित है।

प्रोफेसर मैक्समूलर ने वैदिक साहित्य का क्रम इस प्रकार बताया हैःµ

पहले वेद फिर बा्रह्मण और फिर सूत्र बने। यदि यह कथन सत्य है तो पुरुष सूक्त ब्राह्मणों से पहले बना। प्रश्न यह उठता है कि क्या प्रोफेसर मैक्समूलर के सिद्धांत को अक्षरशः मान लिया जाए? यदि माना जाए तो इससे दो परिणाम निकलते हैंःµ

  1. ऋग्वेद के समय में चार वर्ण थे, परंतु शतपथ ब्राह्मण के समय केवल तीन ही वर्ण

रह गए, या

  1. यह कि शतपथ ब्राह्मण में पूरी व्याख्या नहीं है।

पहला परिणाम तो प्रत्यक्षतः असंभव है। इस तरह पहला प्रश्न व्यर्थ है। दूसरा भी इसलिए मानने योग्य नहीं है, क्योंकि दोनों ब्राह्मणों में पुरुष सूक्त के विषय में मतभेद हैं। वर्ण व्यवस्था पूर्ण रूप से वर्णित है। अतएव मैक्समूलर का कथन मानें तो चारों वैदिक संहिताओं के बनने के बाद ब्राह्मण बने, सर्वथा निराधार है और मानने योग्य नहीं है। इसके विपरीत बेलवलकर और रानाडे का कहना है कि कुछ अंश वेदों के पहले और कुछ बाद में बने। अस्तु ब्राह्मण ग्रंथों का कुछ अंश भी वेदों की समाप्ति के पहले बनना असंभव भी नहीं है। यदि यह ठीक है तो ऐसा प्रतीत होता है कि ब्राह्मण गं्रथ शतपथ और तैत्तिरीय ब्राह्मण जिनमें केवल तीन वर्णों का वर्णन है, पुरुष सूक्त से पहले बने। पुरुष सूक्त के विश्लेषण से क्या निष्कर्ष निकलता है? पुरुष सूक्त ऋग्वेद में एक क्षेपक है। इसलिए यह कोई तर्क नहीं कि आर्य समुदाय में शुरू में ही चार वर्ण थे।

उपरोक्त तर्कों के आधार पर मेरे इस सिद्धांत में शूद्रों की उत्पत्ति पर कोई समस्या नहीं है, जैसा कि अध्याय के आरंभ में कहा गया है। यदि कोई समस्या आती भी है तो इसका कारण यह समझ लेना है कि पुरुष सूक्त मान्य है। यह बता दिया गया है कि यह कल्पना निराधार है। इसलिए मुझे ऐसा समझने में कोई कठिनाई नहीं है कि आर्यों के केवल तीन वर्ण थे और शूद्र दूसरे वर्ण-क्षत्रिय से संबद्ध थे।