अध्याय 9. ब्राह्मण बनाम शूद्र - Page 144

ब्राह्मण बनाम शूद्र

ने देखा कि वे किसी प्रकार नहीं मरते वे अपनी कुटी पर चले आएं।’’

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इन तीनों ऋषियों के विवाद के ये केवल तीन उदाहरण हैं। झगड़ा बराबर चलता रहा। महाभारत ख्1, के शल्य पर्व से पता चलता है कि विश्वामित्र ने वशिष्ठ को काटने की भी चेष्ठा की थी। यथाःµ

‘‘वशिष्ठ तथा विश्वामित्र में कड़ी शत्रुता थी। वशिष्ठ का विस्तृत आश्रम स्थान, तीर्थ में था। विश्वामित्र का आश्रम उसके पूर्व में था। ये दोनों घोर तपस्या कर रहे थे। अपनी शक्ति एक दूसरे को प्रदर्शित कर रहे थे। विश्वामित्र ने वशिष्ठ की शक्ति देखकर सोचा और यही ध्यान करते रहे कि सरस्वती वशिष्ठ को बहाकर मुझे दे दें। तो मैं उसे मार डालूं। ऐसा ध्यान करके और क्रोध में लाल नेत्र करके विश्वामित्र ने नदियों की रानी (सरस्वती) को बुलाया। तब सरस्वती हाथ जोड़कर डरते कांपते विधवावेश में विश्वामित्र के पास आई और बोली -क्या आज्ञा है। क्रोधित विश्वामित्र ने कहा - ‘‘वशिष्ठ को शीघ्र यहां बहा लाओ, ताकि मैं उसे मार डालूं। कमलाक्षी सरस्वती डर के मारे घबराई हुई हाथ जोड़ खड़ी रही। मुनि ने फिर वही आज्ञा दी। सरस्वती ने विचारा, यह संकल्प कितना पाप पूर्ण है। परंतु विश्वामित्र के शाप के डर से वशिष्ठ के पास गई और सब कुछ कह सुनाया। वशिष्ठ ने उसे घबराई, पीली पड़ी और डरी हुई देखकर कहाµ मुझे मुनि के पास ले चल, कहीं वे तुझे शाप न दे दें। तब वह वशिष्ठ को ले चलीं। सरस्वती ने सोचा ये ऋषि कितने महान हैं। मुझे इनका कृपा पात्र बनना चाहिए। उन्होंने कौशिक मुनि को किनारे पर तपस्या करते देखा। वह किनारे को बहाकर ले गई वशिष्ठ जब बहने लगे तो उन्होंने सरस्वती की स्तुति कीµ हे सरस्वती, तुम ब्रह्मा के कमंडल से निकल कर संपूर्ण पृथ्वी पर बहती हो। स्वर्ग में रह कर बादलों को पानी देती हो। तुम बल, तेज, यश, बुद्धि का प्रकाश हो। तुम वाणी हो, तुम स्वाहा हो, यह संसार तुम्हारे अधीन है। ‘‘तुम चार रूप से सर्व प्राणियों में निवास करती हों।’’ जब विश्वामित्र ने देखा कि वशिष्ठ बहे जा रहे हैं तो उनका वध करने के लिए अस्त्र ढूंढ़ने लगे। ब्रह्म हत्या से बचने हेतु सरस्वती वशिष्ठ को पूर्व की और बहा ले गई। इस प्रकार विश्वामित्र की आज्ञा का पालन भी हो गया और वशिष्ठ बच गए। यह देखकर विश्वामित्र ने सरस्वती को शाप दिया कि हे नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती तूने मुझे धोखा दिया इसलिए तेरे पानी के साथ रक्त भी बहेगा। शाप ग्रस्त सरस्वती रक्तिम जल के साथ एक वर्ष तक बहती रही। जहां वशिष्ठ का आश्रम था, वहां असुर लोग आकर रक्तपात और नृत्य करने लगे। ऋषियों ने सरस्वती की यह दशा देकर उसे शाप से मुक्त कराया।’’

विश्वामित्र और वशिष्ठ की शत्रुता केवल दो पुरोहितों की शत्रुता नहीं थी, यह शत्रुता एक ब्राह्मण पुरोहित और एक क्षत्रिय पुरोहित की थी। वशिष्ठ ब्राह्मण और विश्वामित्र क्षत्रिय थे। वे राजवंश के क्षत्रिय थे। ऋग्वेद 3.33.11 में विश्वामित्र को कुशिक का

  1. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 420-422