130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
पुत्र बताया गया है। विष्णु पुराण में विश्वामित्र का और अधिक वृतांत ख्1, है। कहा गया है कि विश्वामित्र गाद्यी के पुत्र थे जो राजा पुरूरवा के वंश के थे। हरिवंश ख्2, में भी इस कथा का वर्णन है।
ऋग्वेद (3.1.21) से ज्ञात होता है कि विश्वामित्र के वंश में पुश्त ख्3, दर पुश्त यक्षाग्नि जलाई जाती थीं। ऋग्वेद से यह ज्ञात होता है कि विश्वामित्र ने इस वेद की बहुत सी ऋचाओं को बनाया था और वे राजर्षि मान जाते थे। उन्होंने ऋग्वेद (3.62.10) में परम् पवित्र गायत्री मंत्र बनाया था। वे क्षत्रिय कुल भरत के वंश ख्4, के थे। यह मालूम होता है कि ब्राह्मण और क्षत्रियों में निम्नलिखित बातों के बारे में झगड़ा थाःµ
- दान लेने का अधिकार। ब्राह्मणों का दावा था कि दान लेना केवल ब्राह्मणों का ही
अधिकार ख्5, है।
- वेद पढ़ाने का अधिकार। ब्राह्मणों का दावा था कि क्षत्रिय केवल वेद पढ़ सकता
है। उसको वेद पढ़ाने का अधिकार नहीं है। वेद पढ़ाने का अधिकार केवल ब्राह्मण्
ों को ही है।
- यज्ञ कराने का अधिकार। ब्राह्मणों का यह कहना था कि क्षत्रिय केवल यज्ञ करा
सकता है यज्ञ कर नहीं सकता। यज्ञ करने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को है।
इन तीनों में विशेषतः झगड़े में ये दोनों एक दूसरे के विरोधी रहे। इसकी पुष्टि त्रिशंकु की कथा से होती है। यह कथा रामायण ख्6, में इस प्रकार कही गई हैः
इक्ष्वाकु वंश में राजा त्रिशंकु की इच्छा हुई कि ऐसा यज्ञ किया जाए जिससे इसी शरीर से स्वर्ग प्राप्त हो। उसने वशिष्ठ को बुलाया वशिष्ठ ने कहा कि यह असंभव है। त्रिशंकु दक्षिण की ओर गया जहां वशिष्ठ के सौ पुत्र तपस्या करते थे और उनसे भी इस बात की प्रार्थना की। राजा ने बड़ी नम्रता से प्रार्थना की - ‘‘हम अपने पुरोहित को संकट के समय का सहायक समझते हैं। वशिष्ठ के बाद हम तुम्ही लोगों को कुल देवता समझेंगे। उन लोगों ने उत्तर दियाः मूर्ख तुम्हारे गुरू ने ठीक बात बताई थी। उनकी बातों को ठुकरा कर तुम दूसरों के पास आए हो। वह इक्ष्वाकु कुल के सबसे बड़े और मान्य गुरू हैं। जब वशिष्ठ ने इंकार कर दिया तो हम उसे कैसे कर सकते हैं? हे मूर्ख राजा, तुम अपनी राजधानी को वापस जाओ। वशिष्ठ त्रैलोक्य के गुरू होने योग्य हैं। हम उनका अनादर नहीं कर सकते।’’ राजा ने कहा - ‘‘चूंकि वशिष्ठ और आप लोगों ने मेरी प्रार्थना नहीं मानी, अतः कोई और उपाय किया जाएगा।
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 349
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 353
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 316
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 356
इसलिए मनु ने कहा कि यदि राजा शूद्र को दान देना चाहे, तो काम करा कर दे। दान का अर्थ है कि
बिना काम कराए दिया जाए।
- म्यूर खंड 1, पृष्ठ 401-404