132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
ही थी। यह शत्रुता सुदास के पुत्र और वशिष्ठ के पुत्रों में भी चली। तैत्तिरीय संहिता ख्4, में कहा गया है - ‘‘पुत्र की मृत्यु के बाद वशिष्ठ ने सुदास के पुत्रों से बदला लेने के लिए पुत्रोत्पत्ति की इच्छा की। उन्होंने यज्ञ किया और पुत्र प्राप्त करके सुदास से बदला लिया। यही बात कौशीतकी ब्राह्मण से भी सिद्ध ख्1, होती है।
वशिष्ठ ने अपने पुत्रों के वध के बाद सोचा, मैं संतान और पशुओं से संपन्न बनने के लिए सुदास को नीचा दिखाऊंगा। उन्होंने आहुतियां दीं। वशिष्ठ ने यज्ञ किया और सुदास को हराया ख्2, ।
II
राजाओं और ब्राह्मणों के विवाद का केवल एक उदाहरण अर्थात सुदास और वशिष्ठ विवाद नहीं है। पुराणों में राजाओं और ब्राह्मणों के और भी विवादों का वर्णन है उन कथाओं का उल्लेख भी सार्थक मालूम होता है। पहली कथा राजा बने की है। हरिवंश में इस कथा ख्3, का उल्लेख इस प्रकार हैः-
अंग नाम के एक प्रजापति थे। ये अत्री वंशज थे। उनका लड़का प्रजापति बेन था, जो कर्तव्य पराण था। वह मृत्यु की पुत्री सुनीति से उत्पन्न हुआ था। यह पुत्र अपने मातृवंश के कारण अपना कर्तव्य छोड़कर अति कामी और विलासी बन गया। वह वेद को नहीं मानता था। उसके राज्य में लोग धर्म ग्रंथ नहीं पढ़ते थे और यज्ञ नहीं होता था। उसने आज्ञा दी थी कि यदि कोई यज्ञ करे तो मेरे नाम से और मेरे हेतु करे। तब मरीचि आदि ऋषियों ने उसे ऐसा करने से रोका और कहा कि तुम अग्नि के यज्ञ के अनाधिकारी हो, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। उसने मूर्खतावश ऋषि का मजाक उड़ाते हुए कहा - ‘‘कर्तव्य का बताने वाला मैं हूं। मैं किसी की आज्ञा मानूं?’’ मेरे जैसा तेजस्वी और धर्मात्मा पृथ्वी पर कौन है? तब ऋषि लोग क्रूद्ध हो गए। उन लोगों ने बेन को पकड़ कर उसकी वाम जंघा का मंथन किया। उससे एक काले रंग का नाटा पुरुष पैदा हुआ और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। अत्रि ने उसे क्रुद्ध होता देखकर बैठने के लिए कहा। उसी से निषाद वंश पैदा हुआ।’’
दूसरा राजा जिसका ब्राह्मणों से विवाद था, पुरूरवा था। यह इला का पुत्र और वैवस्वत मनु का पौत्र था। उसके विवाद का वर्णन महाभारत ख्4, के आदि पर्व में इस प्रकार हैः-
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 328
इस संबंध में कुछ संदेह है कि यह शत्रुता सुदास के साथी थी या सुदास के पुत्रों के साथ। यह संदेश
सात्यायन और कोशीतकी ब्राह्मणों के कारण उत्पन्न हुआ, जिनमें कहा गया है कि यह शत्रुता सुदास के
पुत्रों के साथ थी न कि सुदास के साथ। दूसरी ओर मनु को विश्वास है कि सुदास ने ही उन्हें सताया।
सदगुरूशिष्य में कथन है कि वह सौदास नहीं बल्कि सुदास ही था जबकि वृहद देवता ने इसी मंत्र में
सुदास कहा है। इसका निराकरण तभी हो सकता है जब सौदास को सुदास के परिवार का माना जाए,
जिसमें सुदास और उसके पुत्र भी आते हैं।
म्यूर, खंड 1, पृष्ठ 302
म्यूर, खंड 1, पृष्ठ 307