अध्याय 9. ब्राह्मण बनाम शूद्र - Page 149

134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

मार दी। ऋषियों ने क्रूद्ध होकर उसे शाप दिया - ‘‘तू दस हजार वर्ष के लिए सर्प हो जा।’’ नहुष फौरन सर्प हो गए, कश्यप ने इंद्र से कहा - ‘‘ ब्राह्मणों के शाप से नहुष का पतन हो गया, अब आप स्वर्ग में आएं।’’

चौथी कथा राजा निमि की है। यह कथा विष्णु पुराण ख्1, में इस प्रकार हैःµ

निमि ने वशिष्ठ से कहा कि एक ऐसा यज्ञ कराओ, जिसमें एक हजार वर्ष

लगें। वशिष्ठ ने कहा कि पांच सौं वर्ष का काम हम इंद्र से पहले ही ले चुके हैं।

उसके बाद हम लौटेंगे। यह समझ कर कि राजा ने इसे स्वीकार कर लिया है वशिष्ठ

चले गए। जब लौटकर आए तो वशिष्ठ ने देखा कि गौतम ऋषि यज्ञ करा रहे है।

इस अपमान से रूष्ट होकर वशिष्ठ ने निमि को शाप दिया कि वह निंद्रावस्था में

मनुष्य शरीर छोड़ देगा। निमि जब जागे और उन्हें पता चला कि वशिष्ठ ने उन्हें

शाप दिया है तो उन्होंने वशिष्ठ को भी शाप दिया और मर गए। यज्ञ से देवताओं ने

प्रसन्न होकर कहा, हम फिर निमि को जीवन दान दे सकते हैं। राजा ने अस्वीकार

किया। तब देवताओं ने निमि को पलक पर रहने का स्थान दिया। इसलिए पलक

गिरने में अगले वाले समय को ‘‘निमेष’’ कहते हैं।’’

‘‘ये विवाद मनुस्मृति में भी आते हैं। ख्2, ’’

मैक्समूलर की पुस्तक ‘‘सेक्रेड बुक्स आफ ईस्ट’’ के अनुसार मनुस्मृति में कहा है कि ‘‘गर्व त्याग देने से ऋषियों को भी राज्य प्राप्त हुआ है और गर्व के कारण राजाओं का नाश हुआ है, जैसे बेन, नहुष का पुत्र सुदास, समुख और निमि।’’

दुर्भाग्य से इन घटनाओं के संदर्भ में शूद्रों की स्थिति का अहसास ही नहीं किया गया। इसका यह कारण है कि किसी ने यह नहीं सोचा कि यह टकराव ब्राह्मणों और शूद्रों के बीच था। अन्यों को शूद्र नहीं बताया गया बल्कि उन्हें इक्ष्वाकु वंश का कहा गया है। यह कहना उचित है कि वे सब शूद्र थे। मनु तक हो इस बात का एहसास नहीं था। उन्होंने भी इस संघर्ष को ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय कहा है। डा. म्यूर भी यह नहीं समझ पाए कि सुदास शूद्र था और यह कहते हुए कि यह संघर्ष क्षत्रियों और ब्राह्मणों के मध्य था, घिसे पिटे सिद्धांत का प्रमाण दिया है। एक दृष्टि से यह उचित है क्योंकि शूद्र क्षत्रियों की ही एक शखा थे। यह कहना अधिक उचित होता है कि यह संघर्ष ब्राह्मणों और शूद्रों के बीच था। जो गलती एक बार हो गई हो वह होती ही चली आई और भारतीय आर्य समुदाय का यह वास्तविक सत्य गर्दों-गुबार से ढक गया। इसी भ्रांति को दूर करने के लिए इस अध्याय को यह नाम दिया गया है तिक ब्राह्मणों और शूद्रों के संघर्ष को समझा जा सके और यह बात समझ में आ सके कि क्षत्रिय किस प्रकार दूसरी सीढ़ी से गिर कर वर्ण व्यवस्था की चौथी सीढ़ी पर आ गए।

  1. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 316

  2. मैक्समूलरर्स सेक्रेड बुक्त आफ दि ईस्ट, खंड-25, पृष्ठ 222