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शूद्रों का पतन
ब्राह्मणों ने शूद्रों को वर्ण व्यवस्था के दूसरे स्थान से गिरा कर चौथे स्थान पर धकेल देने के लिए ‘‘क्या हथकड़े अपनाए?ं
अब तक यह सिद्ध हुआ कि शूद्र मूलतः द्वितीय वर्ण-क्षत्रिय वर्ग के एक अंग थे और उनके साथ ब्राह्मणों का द्वेष इतना बढ़ चुका था कि ब्राह्मणों ने शूद्रों को उनके दूसरे वर्ण से अपदस्थ पर चौथे वर्ण में पहुंचा दिया। शूद्रों का दर्जा गिराने के लिए वे क्यों प्रेरित हुए, इस प्रश्न पर विचार करना होगा। यहां यह प्रश्न उठता है कि शूद्रों के पराभव के लिए ब्राह्मणों ने क्या हथकंडे अपनाए? उन्होंने शूद्रों को समाज की दृष्टि में हेय बनाने और अपने अपमान का बदला चुकाने की कया तरकीब खोजी?
उनके हथकंडों का जवाब शूद्रों का उपनयन संस्कार करने से इंकार करना है। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसी नीति से उन्होंने उनका स्थान हेय बनाया।
कदाचित यहां यह जान लेना भी प्रासंगिक होगा कि ‘‘उपनयन’’ क्या है तथा भारतीय आर्यों के समाज में इसका क्या महत्व था। इसकी जानकारी के निमित्त उपनयन संस्कार विधि का वर्णन किया जाना उचित रहेगा।
प्रारंभ में उपनयन संस्कार एक साधारण सा संस्कार होता था। बालक समिधा (एक प्रकार का ऋण) लेकर आचार्य के पास जाता था और विद्याध्ययन हेतु ब्रह्मचारी बनने की याचना करता था तथा अध्ययन के लिए उसके पास रहने का अनुरोध करता था। समय के साथ-साथ इसका विस्तार होता गया। आश्वलायन गृह ख्1, सूत्र में ‘‘उपनयन’’ के वर्णन से इसके विस्तार का पता चलता है।
‘‘बालक का सिर मुंडित हो। वह नवीन वस्त्र पहने हो, यदि ब्राह्मण हो तो मृग
चर्म धारण किए हो, क्षत्रिय हो तो सरू धर्म पहने हो और यदि वैश्य हो तो बकरे
का चर्म धारण किए हो। यदि वस्त्र पहने हों तो वह रंगीन हो - ब्राह्मण के लिए
केसरिया, क्षत्रिय के लिए लाल, वैश्य के लिए पीला। वह मेखला पहने और छड़ी
- काणे हिस्ट्री आफ धर्मशास्त्र, खंड-2 (एक) पृ.-281-283