अध्याय 10. शूद्रों का पतन - Page 151

136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

लिए हो। बालक गुरू का हाथ पकड़े और गुरू घी का हवन करे और अग्नि के

उत्तर में पूर्व-मुख हो आसीन हो। बालक गुरू के सामने पश्चिम की ओर मुंह करके

बैठे। गुरू अपनी तथा बालक की अंजलि में जल भर कर ऋग्वेद के मंत्र (5.82.1)

का पाठ करे और अपने हाथ का जल बालक की अंजलि के पानी में डाल दें।

फिर ‘‘सावित्री’’ की आज्ञा से ‘‘अश्विनी कुमारों को बांह से’’ और पूषण को हाथों

से, मंत्र पढ़कर बालक के हाथ पकड़े। सावित्रि ने तेरा हाथ पकड़ा, मंत्र पढ़कर

दुबारा बालक के हाथ पकड़े, ‘‘अग्नि तेरा गुरू है’’ कह कर तीसरी बार बालक

का हाथ पकड़े। गुरू के इंगित करने पर बालक सूर्य की ओर देखे। गुरू तब ‘‘देवी

सावित्री यह ब्रह्मचारी है इसकी रक्षा करो।’’ मंत्र का पाठ करे। तदुपरांत गुरु कहे

- ‘‘तू किसका ब्रह्मचारी है। ‘‘तू प्राण का ब्रह्मचारी है।’’ मैं तुझे प्रजापति को देता

हूं। फिर ऋग्वेद के (3-8-4) मंत्र का पाठ करते हुए बालक को दाहिनी ओर

घुमाकर उसका हृदय छुए। तब ब्रह्मचारी चुपचाप अग्नि में लकड़ी रख दें। श्रुति के

अनुसार प्रजापति का कार्य चुप रह कर करना चाहिए। कुछ लोग अग्नि का मंत्र

पड़ते हैंः हम यह लकड़ी इसलिए रखते हैं कि आप बढ़ें और ब्राह्मण द्वारा हम भी

वृद्धि प्राप्त करें, स्वाहा। लकड़ी रख कर अग्नि को छू कर बालक तीन बार कहे

- ‘‘मैं तेज से अभिशिक्त होता हूं, अग्नि मुझे बृद्धि, बंश और बल दे। सूर्य मुझे,

बुद्धि वंश और बल दे। ‘‘हे अग्नि आप तेज हैं -मैं तेजस्वी होऊं, आप बल हैं -

मैं बलशाली होंऊं, आप जलाने की शक्ति रखती हैं मैं भी भस्म करने की शक्ति

से संपन्न होऊं। ‘‘इसके उपरांत शिष्य गुरु का चरण स्पर्श करे और कहे -‘‘मुझे

सावित्री पढ़ाए, पढ़ाए।’’ गुरु बालक को धीरे-धीरे गायत्री मंत्र पढ़ाए और कहेµ

‘‘मैं तेरा मन कर्तव्य में लगाता हूं। तुम्हारा मस्तिष्क मेरे मस्तिष्क के समान हो। तुम

एकाग्रचित होकर मेरी आज्ञा का पालन करो। बृहस्पति तुम्हें मेरी सेवा में लगाए।’’

उसके बाद बालक की कटि में मेखला बांधे और दंड (छड़ी) पकड़ाए। तदुपरांत

ब्रह्मचारी के कर्म समझाएं- ‘‘ब्रह्मचारी हो, पानी पीओ, सेवा करो, दिन में शयन न

करो, गुरु पर विश्वास रखकर वेदाध्ययन करो’’।

प्रातः और सांय भिक्षाटन करना, यज्ञ के लिए लकडि़यां चुनना, भिक्षाटन में प्राप्त सामग्री गुरु को देना और दिन में विश्राम न करना।

उपनयन संस्कार का समापन गुरु द्वारा बालक को मंत्र पढ़ाने के साथ होता है। यहां यह कहना कठिन है कि उपनयन से पूर्व गायत्री मंत्र का पढ़ाया जाना आवश्यक क्यों है?

उपनयन संस्कार के उपरोक्त वर्णन से दो बातें स्पष्ट होती हैंः-

  1. उपनयन का अभिप्रायः एक व्यक्ति को आचार्य के पास वेदाध्ययन के निमित्त भेजना था और वेद पाठ गायत्री से शुरू होता था।

  2. दूसरे यह कि उपनयन संस्कार के लिए कुछ वस्तुएं बहुत जरूरी होती थीं जो इस तरह हैंः - (1) दो वस्त्र जिनमें एक शरीर के नीचे के भाग के लिए जिसे वास