अध्याय 10. शूद्रों का पतन - Page 152

शूद्रों का पतन

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कहा जाता था और दूसरा शरीर के ऊपरी भाग का वस्त्र जो उत्तरीय कहलाता था। (2) दंड (छड़ी) और (3) मेखला या कमर में बांधने के लिए मूंज की रस्सी।

यदि इस वर्णन का आज के उपनयन संस्कार से तुलना करें तो आश्चर्य होगा कि प्राचीन काल के उपनयन संस्कार में यज्ञोपवीत (जनेऊ) का कोई उल्लेख नहीं है। आधुनिक उपनयन का मुख्य ध्येय यज्ञोपवीत धारण करना मात्र ही रह गया है और इस यज्ञोपवीत ख्1, (याज्ञवलक्य इसे ब्रह्मसूत्र कहता है) की भूमिका इतनी प्रबल हो चुकी है कि इससे बनाने तथा प्रयोग के लिए विस्तृत नियमावली तक तैयार कर ली गई है।

यज्ञोपवीत में नौ-नौ बालिश्त के तीन तार होते हैं। प्रत्येक तार एक देवता के लिए होता है।

यज्ञोपवीत सीने से ऊपर या नाभि ख्2, के नीचे तक न हो। एक व्यक्ति एक बार में एक से अधिक यज्ञोपवीत धारण कर सकता है।

यज्ञोपवती हर वक्त धारण करना चाहिए। जनेऊ पहले बिना भोजन करना अथवा जनेऊ दाहिने कान पर टांगे बिना मल-मूत्र विसर्जित करने पर स्नान करना, प्रार्थना करना, व्रत करना, आदि प्रायश्चित करने पड़ेंगे। नौ तंतुओं के नौ देवता हैं। देवता स्मृति के अनुसार ये हैं, ओंकार, अग्नि, नाग, सोम, पितृ, प्रजापति, वायु, सूर्य, विश्वदेव। इसमें कुछ परिवर्तन भी आए। मेघातिथि का कहना है कि इष्टी, पशुबली, सोम यज्ञ, तीन सूत्रों का एक ही यज्ञोपवीत हो परंतु इसकी तीन श्रेणियां हों अहिन, एका और सूत्र तीन अग्नियां हों सात सोमसमस्व और सात फेर हों।

ब्रह्मचारी केवल एक जनेऊ पहने, एक स्नातक और गृहस्थ दो जनेऊ पहने यदि कोई दीर्घजीवी होना चाहे तो दो से अधिक जनेऊ पहने। स्नातक को सदा दो जनेऊ पहनने चाहिएं। गृहस्थ 10 जनेऊ तक जितने चाहे पहन सकता है।

दूसरे व्यक्ति का यज्ञोपवीत तथा वस्तुएं जैसे जूते, माला, आभूषण अथवा कमंडल आदि धारण करना वर्जित ख्3, है।

यज्ञोपवीत तीन प्रकार से (1) निवीत (2) प्रसन्वित तथा (3) उपवीत धारण करने का प्रावधान है।

  1. याज्ञवलक्य (1-16 तथा 133) इस ब्रह्म सूत्र कहा है।

  2. इस काणे के धर्म सूत्र पृष्ठ 292 पर लिखा हैः-

नौ तंतुओं के नौ देवता हैं। देवता स्मृति के अनुसार ये हैं, ओंकार, अग्नि, नाग, सोम, पितृ, प्रजापति,

वायु, सूर्य, विश्वदेव। इसमें कुछ परिवर्तन भी आए। मेघातिथि का कहना है कि इष्टी, पशुबली, सोम

यज्ञ, तीन सूत्रों का एक ही यज्ञोपवीत हो परंतु इसकी तीन श्रेणियां हों अहिन, एका और सूत्र तीन

अग्नियां हों सात सोमसमस्व और सात फेर हों।

ब्रह्मचारी केवल एक जनेऊ पहने, एक स्नातक और गृहस्थ दो जनेऊ पहने यदि कोई दीर्घजीवी होना

चाहे तो दो से अधिक जनेऊ पहने। स्नातक को सदा दो जनेऊ पहनने चाहिए। गृहस्थ 10 जनेऊ तक

जितने चाहे पहन सकता है।

  1. काणे हिस्ट्री आफ धर्मशास्त्र खंड 2 (एक) पृष्ठ 293