138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
जब इसे गले में हृदयस्थल से दो अंगुल नीचे और नाभि से दो अंगुल ऊपर पहनते हैं तो यह निवीत कहलाता है। उपवीत बांए कंधे से दायीं ओर तो दाएं कंधे से बांयी ओर धारण करने से प्रसन्वित कहा जाता है।
यज्ञोपवीत का प्रारंभ कैसे हुआ। इसके विषय में तिलक महोदय का मत ख्1, हैः-
वैदिक ग्रंथों में प्रजापति को ओरियन अर्थात मृगशिरा कहा जाता है, अन्यथा इसे यज्ञ भी कहा जाता है। अतः कटि प्रदेश में धारण किया जाने वाला पट प्रजापति के नाम पर स्वाभाविक रूप से यज्ञोपवीत कहलाता है। अब यह ब्राह्मणों का जनेऊ कहलाने लगा है। यहां यह प्रश्न उठता है कि जनेऊ ओरियन से कमर बंद (पटुका) का स्वरूप है। मुझे यह निम्नलिखित आधार पर सत्य प्रतीत होता हैः-
स्थानीय शोधकर्ताओं के अनुसार यज्ञोपवीत यज्ञ$उपवित शब्द की संधि है। परंतु इस विषय में मतभेद है। संयुक्त शब्द का अर्थ ‘‘यज्ञ’’ का उपवीत है अथवा ‘‘यज्ञ’’ के लिए उपवीत’’। होत्रियों ने एक स्मृति के अनुसार परमात्मा को यज्ञ कहा है। उनका यह उपवीत है, अतः यज्ञोपवीत कहा गया है। जनेऊ धारण करते समय ‘‘यज्ञोपवीत परमंपवित्र प्रजयतेयत्सहजं पुरस्ताब्रं’’ मंत्र पढ़ा जाता है।
यह मंत्र किसी संहिता में उपलब्ध नहीं है। बोधायन ने इसे ब्रहमोपनिषद में लिखा है। यह मंत्र हाओमा येष्ट के समान है जिसका अर्थ है -‘‘यज्ञोपवीत उच्च और पवित्र है। यह ब्रह्मा के साथ ही उत्पन्न हुआ है। पुरस्तात शब्द अवेस्ता में ‘‘पोरवानिस शब्द का समानार्थी है तथा डा. हॉग द्वारा उठाए गए प्रश्न का यह निश्चय कर समाधान हो जाता है कि ‘‘सहज’’ प्रजापति के अंग से उत्पन्न हुआ है, यह ‘‘मेमन्युतस्तेम’’ का समानार्थी है। यह समानता संयोगवश ही नहीं है। मेरे मतानुसार जनेऊ को ओरियन के पट से लिया गया प्रतीत होता है। उपवीत अर्थात बुनना वस्त्र है धाग नहीं। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि कमर बंद पट का स्वरूप अधोवस्त्र ही यज्ञोपवीत का वास्तविक स्वरूप है और प्रजापति के नाम से जुड़ा होने के कारण पवित्र माना गया है।’’
तिलक महोदय का मत निःस्संदेह रोचक है। किन्तु इससे कुछ कठिनाइयां हल नहीं हो पातीं। साथ ही इससे ‘‘उत्तरीय’’ और ‘‘वास’’ से यज्ञोपवीत का संबंध भी स्पष्ट नहीं हो पाता। क्या यज्ञोपवीत उपरोक्त दो वस्त्रों के अतिरिक्त था? यदि ऐसा है तो उपनयन संस्कार के प्राचीन वर्णन में इसका उल्लेख क्यों नहीं किया गया। यदि जनेऊ की उपरोक्त वस्त्रों का विकल्प है तब उपनयन में वस्त्र धारण करने का उल्लेख क्यों है।
अब मैं एक दूसरा सिद्धांत प्रस्तुत हूं। यज्ञोपवीत संस्कार गोत्राधिकार के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य एक व्यक्ति को एक विशेष गोत्र से जोड़ना होता था। उपनयन से इसका संबंध नहीं है। उपनयन तो वेदाध्ययन के निमित्त किया जाता था। अधिकांश लोग यह नहीं जानते थे कि प्राचीन आर्य विधान के अनुसार पुत्र को जन्म से ही पिता का गोत्र देने के लिए पिता को एक विशेष संस्कार कराना पड़ता था और तभी पुत्र अपने पिता के
- ओरियन, पृ. 144-146