शूद्रों का पतन
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गौत्र का अधिकारी बनता था। इस संबंध में आर्यों के समाज में दो नियम प्रचलित थे। एक अशुचिता का नियम था और दूसरा गोद लेने का। किसी की मृत्यु होने पर अशुचिता की अवधि निकटस्थ संबंधी के लिए और दूरस्थ संबंधी के लिए अलग-अलग होती थी। यदि पुत्र का यज्ञोपवीत नहीं हुआ है तो अशुचिता (सूतक) मात्र कुछ दिन ख्1, के लिए ही होती थी। जहां तक गोद ख्2, लेने का प्रश्न है, कोई ऐसा व्यक्ति गोद नहीं लिया जा सकता था जिसका यज्ञोपवीत हो चुका हो। इन दोनों नियमों से क्या तात्पर्य है? अशुचिता की अवधि पुत्र के लिए अल्प इसलिए होती थी कि यज्ञोपवीत न होने के कारण वह औपचारिक रूप से अपने पिता का गौत्र धारण नहीं कर सका था। गोद लेने का अर्थ गोद लेने वाले पिता के गौत्र से संबंधित हो जाता था। यज्ञोपवीत होने पर पुत्र पिता के गोत्र का हो जाता था।
उक्त दोनों नियमों से स्पष्ट हो जाता है कि यज्ञोपवीत का संबंध गोत्र से था न कि उपनयन से। इस बात की पुष्टि जैन साहित्य से भी होती है। आचार्य रविसेन द्वारा रचित पदम पुराण के चतुर्थ पर्व के श्लोक 87 में यह उल्लेख ख्3, है।
‘‘हे भगवान, आपने हमें क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की उत्पत्ति बता दी। अब हम उन लोगों की उत्पत्ति जानना चाहते हैं जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं।’’
‘‘जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं’’ यह वाक्य महत्वपूर्ण है। निस्संदेह यह अभिव्यक्ति ब्राह्मण के लिए है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि एक समय था जब केवल ब्राह्मण ही यज्ञोपवीत धारण किया करते थे, अन्य जातियां या वर्ण नहीं, क्योंकि गोत्र ब्राह्मणों में ही होते थे। इससे यह तथ्य प्रकट हुआ कि यज्ञोपवीत संस्कार पुत्र को पिता के गोत्र में लाने या पिता के गोत्र से संबंध स्थापित करने के लिए किया जाता था। इसका यज्ञोपवीत उपनयन संस्कार से कोई संबंध नहीं था। उपनयन तो वेदाध्ययन के निमित्त होता था।
यदि यह सत्य मान लिया जाए तो यज्ञोपवीत और उपनयन संस्कार अलग-अलग थे जो कालांतर में एक हो गए। यह एकीकरण स्वाभाविक भी है। यदि पुत्र बि यज्ञोपवीत विद्याध्ययन हेतु जाता था तब आचार्य द्वारा उसको अपने गोत्र में शामिल करने का भय रहता था। इस भय के निराकरण के लिए ही लोग अपने पुत्रों को यज्ञोपवीत संस्कार के उपरांत ही वेदाध्ययन के लिए भेजते थे। संभवतः यही कारण था कि कालांतर में ये दोनों यज्ञोपवीत और उपनयन संस्कार एक साथ होने लगे। कुछ भी हो उपनयन का संबंध वेदाध्ययन से है।
III
मुझे अपने सिद्धांत का आधार ठोस लगता है। फिर भी लोगों को संदेह तो होगा ही। उक्त मत के संबंध में निम्नांकित शंकाएं उठना स्वाभाविक प्रतीत होता है।
मनुस्मृति अध्याय 5 मंत्र 66-70
कलिक पुराण -काणे, व्यवहार मयूख पृष्ठ 114
नाथूराम प्रेमी जैन साहित्य का इतिहास पृष्ठ 55