140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
क्या उपनयन न होना शूद्रत्व की पहचान है?
क्या शूद्र कभी उपनयन के अधिकारी थे?
उपनयन से वंचित रहना शूद्रों के पतन का कारण कैसे हैं?
शूद्रों का उपनयन बंद करने का ब्राह्मणों को क्या अधिकार था?
इन संभावित शंकाओं का समाधान प्रस्तुत करना मेरा दायित्व है।
IV
पहली शंका के समाधान के लिए सर्वप्रथम यह जान लेना आवश्यक है कि भारत के न्यायालयों ने शूद्रों की पहचान के लिए क्या मानदंड निर्धारित किए हैं।
इस संदर्भ में पहला उदाहरण प्रिवी काउंसिल द्वारा सन् 1937 ई. में एक मुकदमें ख्1, (7. एमआईए 18) में दिया गया निर्णय है।
इसमें यह मामला उठाया गया था कि क्या उस समय भारत में क्षत्रिय थे। एक पक्ष का तर्क था कि क्षत्रिय थे दूसरे पक्ष का तर्क था क्षत्रिय नहीं थे। क्षत्रियों का अस्तित्व न मानने वाले पक्ष का तर्क ब्राह्मणों द्वारा प्रचारित इस सिद्धांत पर आधारित था कि ब्राह्मण परशुराम ने क्षत्रियों का संहार कर दिया था तथा जो बच गए थे उनका मूलोच्छेदन मगध के शूद्र राजा महापदम नंद ने कर दिया था। अतः क्षत्रियों का संपूर्ण विनाश हो गया। केवल ब्राह्मण और शूद्र बचे हैं। प्रिवी काउंसिल ने इसे ब्राह्मणों की कपोल कल्पना कह कर रद्द कर दिया और क्षत्रियों का अस्तित्व स्वीकार कर लिया। यद्यपि प्रिवी काउंसिल ने कोई ऐसा मानदंड स्थापित नहीं किया जिसके आधार पर क्षत्रियों और शूद्रों का अलग अलग अस्तित्व स्थापित हो सके। फिर भी यह निर्णय दिया कि प्रत्येक मामले को उसके तथ्यों के आधार पर तय किया जाए।
दूसरा मामला (आई एल आर 10 कलकत्ता ख्2, 688) को लेकर था कि बिहार के कायस्थ क्षत्रिय हैं अथवा शूद्र। बिहार के कायस्थों ने प्रार्थना की थी कि उनकी स्थिति बंगाल, उत्तर प्रदेश तथा बनारस के कायस्थों की स्थिति से भिन्न है। अतः ये क्षत्रिय हैं। उच्च न्यायालय ने श्रेष्ठता के दावे को खारिज करते हुए उन्हें शूद्र ही माना। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने (मुकदमा नं. आई एल आर-12 इलाहाबाद 328 ख्3, में) उपरोक्त निर्णय को अविश्सनीय माना। न्यायाधीश महमूद ने अपने फैसले के पृ. 334 पर कहाःµ
‘‘दोनों निचली अदालतों ने यह विचार प्रकट किया प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र की
चौधरी रण मरदन सिंह बनाम साहब प्रहलाद सिंह।
राजकुमार लाल बनाम विशेशर दयाल
तुलसी राम बनाम बिहारी लाल