शूद्रों का पतन
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एक पढ़ी लिखी जाति कायस्थ जिससे ये पक्ष संबद्ध हैं, शूद्रों की श्रेणी में आती है जैसा कि मनु ने अपनी स्मृति में या अन्यत्र व्यवस्था दी है। मैंने इस बात की मान्यता पर उठाए गए विचारणीय संदेहों पर गौर किया। यह प्रश्न इसी कारण विचारणीय नहीं है कि यह एक जातीय मुद्दा है बल्कि यह समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग पर हिंदू विधान लागू करने का प्रश्न है। मैं नहीं समझता कि इस मामले पर प्रिवी काउंसिल के न्यायाधीशों का श्री नारायण मित्र बनाम श्री मुक्ति किरण, सुंदरी दास ख्1, या महाशीवा शशिनाथ घोष बनाम श्रीमती कृष्णा सुंदुरी दास ख्2, के संबंध में दिया गया निर्णय लागू करने को कहूं। दोनों ही मामले बंगाल की निचली अदालत में दायर किए गए थे कि लोअर बंगाल के कायस्थों को ऊपरी भारत जैसे उत्तर पश्चिम प्रांत और अवध की 12 कायस्थों की जातियों से भिन्न माना जाए, न ही मैं यह समझता हूं कि विद्वान मुख्य न्यायाधीश और मेरे मित्र टाइरेल का चौधरी हजारी लाल बनाम विष्णु दयाल सन् 1886 की पहली अपील संख्या 113 जिस पर 15 जून, 1887 को फैसला दिया गया के मामले में दिए गए कथित फैसले को स्वीकार करूंगा तो स्वयं इस मामले में मान लिया गया निर्णय था। मैं इसे खारिज करता हूं।’’
तीसरा मुकदमा (20 कलकत्ता डब्ल्यू एन 901 वर्ष 1916) ख्3, इस विवाद को लेकर था कि बंगाल के कायस्थ शूद्र हैं अथवा क्षत्रिय। उच्च न्यायालय ने उन्हें शूद्र करार दिया। इस निर्णय के विरुद्ध प्रिवी काउंसिल ने बंगाल के कायस्थों का मामला ज्यों का त्यों ही छोड़ दिया। वर्ष 1916 से 1926 की अवधि में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अपने दो निर्णयों में बंगाल के कायस्थों को शूद्रों की तान्ती ख्4, और डोम ख्5, जातियों से वैवाहिक संबंध स्थपित करने के आधार पर शूद्र घोषित कर दिया।
उक्त न्यायिक निर्णयों से कायस्थों की स्थिति में अधोपतन आया। वर्ष 1926 में (आई एल आर आर-6 पटना 506) ख्6, में न्यायाधीश ज्वाला प्रसाद ने प्रत्येक स्मृति और पुराण का गहन अध्ययन किया, जिनमें कायस्थों का वर्णन था और अपने 47 पृष्ठ के निर्णय में कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्णय से भिन्न मत प्रकट करते हुए बिहार के कायस्थों को क्षत्रिय घोषित किया।
मद्रास उच्च न्यायालय में वर्ष 1924 में (48 मद्रास-1) एक विरोधी वादी तंजोर राज्य के रिसीवर ख्6, ने दायर किया था जिसमें मद्रास में 1918 में यह विवाद उठा था कि क्या मराठा कायस्थ हैं अथवा शूद्र। मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी के भाई
एस. आर. आई. ए. सप्लिमेंट खंड 149
एल. आर. 7. आई. ए. 250
असित मोहन घोष बनाम निरोद मोहन घोष पलिक
विश्वनाथ घोष बनाम श्रीमती बलाई देसाई
भोलानाथ मित्र बनाम सम्राट
ईश्वर प्रसाद बनाम राय हरिप्रसाद लाल