142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
बेंकोजी, जो मराठा थे, (जिनका नाम एकोजी था) द्वारा दायर किया गया था। तंजौर राज्य के महाराज तथा उनके सभी दूर पास के उत्तराधिकारी बचाव पक्ष में थे। मद्रास उच्च न्यायालय ने 229 पृष्ठ के निर्णय में मराठों को शूद्र माना, क्षत्रिय नहीं, जैसा कि बचाव पक्ष का कहना था।
मराठों से संबंधित 1928 का (आई. एल. आर. 52 बंबई 497) ख्1, एक और विवाद था। न्यायालय ने एक निर्णय दिया। बंबई प्रेसीडेंसी में मराठाओं के तीन वर्ग हैं - (1) पांच परिवार, (2) छियानवें परिवार तथा (3) अन्य 1 प्रथम दोनों परिवार वैधानिक रूप से क्षत्रिय हैं।
मराठों से संबद्ध अंतिम मुकदमा (आई. एल. आर. 1927) 52 मद्रास 492 में अदालत ने कहा - बंबई प्रेसीडेंसी में मराठों की तीन श्रेणियां हैं (1) पांच घर (2) छियानवें घर तथा (3) अन्य। पहली दो श्रेणियां क्षत्रियों की हैं।
अंतिम मुकदमे ख्2, में यह विवाद था कि क्या मदुरै के यादव क्षत्रिय हैं अथवा शूद्र हैं। यादवों ने क्षत्रिय होने का दावा किया था। मद्रास उच्च न्यायालय ने इसे अस्वीकार कर उन्हें शूद्र करार किया।
यह न्यायालय प्रक्रिया संदिग्ध है क्योंकि इसमें नगण्य परिणाम उदघाटित हुए हैं कि क्षत्रिय कौन हैं और शूद्र कौन हैं। बिहार के अपर प्रोविंस (जो अब उत्तर प्रदेश में हैं) और बनारस के कायस्थ क्षत्रिय हैं और बंगाल के शूद्र हैं। मद्रास उच्च न्यायालय ने सभी मराठों को शूद्र माना जबकि बंबई उच्च न्यायालय ने मराठाओं के पांच परिवार और छियानवों परिवारों को क्षत्रिय करार दिया तथा अन्य को शूद्र। यादव समाज को कृष्ण का वंशज होने के कारण क्षत्रिय माना जाता था किन्तु उच्च न्यायालय ने उन्हें शूद्र माना है।
हमारा मुख्य ध्येय यह देखना है कि उपरोक्त मुकदमों का निर्णय देने समय न्यायालयों ने किन प्रमाणों और मानदंडों को दृष्टिगत रखा। ये निम्नलिखित हैंः-
- मुकदमा संख्या आई. एल. आर. 10 कलकत्ता 688 में ये मानदंड अपनाए गए ःµ
(क) दास शब्द का उपनाम के रूप में प्रयोग करना
(ख) यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करना।
कोल्हापुर के महाराजा बनाम सुंदरम अय्यर (1924)
सुब्बाराव हम्बीराव पाटिल बनाम राधा हम्बीराव पाटिल
मोक्का कोमा बनाम अम्मकरटी