शूद्रों का पतन
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(ग) यज्ञ-हवन करने का अधिकार (सामर्थ्य)।
(घ) अशुचिता की अवधि।
(ड.) अवैध पुत्र के उत्तराधिकारी होने या न होने की अर्हता।
(2) मुकदमा संख्या आई. एल. आर. पटना 606 के अनुसार जन ख्याति को प्रमुख आधार माना गया। यदि ख्याति के आधार पर कोई समुदाय क्षत्रिय है तो उसे क्षत्रिय माना जाता था।
(3) मुकदमा संख्या 48 मद्रास -1 में विभिन्न मानदंडों को ध्यान में रखा गया जिसमें प्रथम जातिगत चेतना, द्वितीय उपनयन संस्कार जनेऊ धारण करने से मिला था। तीसरा मानदंड यह था कि सभी गैर ब्राह्मण जातियां शूद्र हैं जबकि वे स्वयं को क्षत्रिय या वैश्य सिद्ध न करें।
(4) मुकदमा संख्या आई. एल. आर. बंबई-497 में ( i ) जाति गत चेतना ( ii ) रीति रिवाज तथा ( iii ) अन्य जातियों द्वारा उक्त भावना को स्वीकार करना, मानदंड अपनाए गए।
विषय से भिन्न कोई भी विद्वान विभिन्न न्यायालयों द्वारा अपनाए गए मानदंडों को उचित नहीं मान सकता। अशुचिता की अवधि अप्रासंगिक है। यज्ञ की पात्रता प्रासंगिक होते हुए भी मान्य नहीं है। जातिगत चेतना को भी सम्पुष्ट मानदंड नहीं माना जा सकता जैसे उपनयन संस्कार के मानदंड भिन्न है। इसे न्यायालयों के समुचित तरीके से प्रस्तुत नहीं किया है। किन्तु इस में कोई संदेह नहीं कि उपनयन संस्कार को ठीक से समझा जाए और समुचित ढंग से उपभोग में लाया जाए तो यह युक्तिसंगत है। एक जाति अपरिहार्य परिस्थितियों में दीर्घकाल तक अपने धार्मिक अनुष्ठानों को सम्पन्न न करा पाने पर अपनी स्थिति से च्युत हो जाती है। न्यायालयों ने उपनयन के संबंध में प्रचलित प्रथाओं और अधिकार में भेद न कर युक्ति मुक्त वर्णन नहीं किया है। फिर भी उपनयन का प्रमाण ठीक हो सकता है। प्रायः अदालतें यह मान कर चली हैं कि प्राचीन समय में जो सत्य था वह आज भी सत्य है। अतएव इसमें उत्पन्न गोरखधंधों से एक ही जाति कहीं क्षत्रिय और कहीं शूद्र मानी गई हैं। प्रमाण यह नहीं कि अमुक जाति यज्ञोपवीत धारण करती है अथवा नहीं। प्रश्न यह है कि उसे इसका अधिकार है या नहीं। अतः यह निर्भाक रूप से कहा जा सकता है कि उपनयन धारणा करने का अधिकार वास्तविक है और उससे यह स्पष्ट होता है कि अमुक व्यक्ति शूद्र है अथवा क्षत्रिय है।
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दूसरी आपत्ति पूर्णतः निराधार है। प्रायः प्रत्येक समाज प्रारंभ में एक होता है और कालांतर में अनेक भागों में विभाजित हो जाता है। अतः यह मान लेना कि आर्यों ने प्रारंभ से ही जाति गत आधार पर शूद्रों और स्त्रियों को उपनयन से वंचित कर दिया था