144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
अनुचित मान्यता है। यह तर्क संगत हो सकता है किन्तु इस संबंध में परिस्थिति जन्म तथा स्पष्ट प्रमाण सुलभ है कि शूद्र और स्त्रियां भी यज्ञोपवीत धारण करने के अधिकारी थे। प्राचीन समाज में उपनयन सभी के लिए अनिवार्य था। इसके लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाएःµ
गूंगे, बहरे और बज्र मूर्ख तथा नपुंसक भी जनेऊ धारण करने के अधिकारी थे। उनके लिए अलग प्रक्रिया थी। गूंगे, बहरे और मूर्ख के लिए उपनयन संस्कार ग्रहण करने हेतु एक विशेष क्रिया विधि थी। यह अन्य से भिन्न थी। सब मंत्र आचार्य द्वारा धीरे से पढ़े जाते थे। अंतर केवल समिधा, यज्ञ, वस्त्र, मृगछाल देने, मेखला, बांधने तथा छड़ी धारण करने में था। लड़का अपना नाम उच्चारित नहीं करता था। यही विधि नपुंसकों, नेत्रहीनों तथा मिर्गी और कुष्ठ रोगियों के लिए प्रयुक्त होती थी।
क्षत्रियों, वैश्यों तथा रथकारों, अम्बष्ठों आदि संकर जातियों के उपनयन के नियमों से स्पष्ट है कि 6 अनुलोम जातियों को भी उपनयन का अधिकार ख्1, था।
पतितसावित्रिकों को उपनयन का अधिकार था। उपनयन की उपयुक्त आयु ब्राह्मण पुत्र के लिए आठवां वर्ष, क्षत्रिय पुत्र के लिए ग्यारहवां वर्ष और वैश्य पुत्र के लिए 12 वर्ष थी। फिर भी यह संस्कार विशेष परिस्थितियों में क्रमशः 16वें, 21वें तथा 24वें वर्ष में हो सकता था। इस आयु तक उपनयन न होने पर व्यक्ति को गायत्री मंत्र के उच्चारण का कुपात्र माना जाता था। इसे ‘‘पतितसाविचिक’’ या सावित्री पतित कहा जाता था। नियमों की कठोरता के कारण निर्धारित आयु निकल जाने पर न तो कोई इसका उपनयन कर सकता था और न उन्हें वेद पढ़ा सकता था और न यज्ञ करा सकता था। यहां तक कि उनके साथ सामाजिक व्यवहार (यथा वैवाहिक संबंध आदि) भी स्थापित नहीं कर सकता था। इतने पर भी नियत प्रायश्चित करने पर उपनयन हो सकता था। ख्2,
बोधायन गृहसूत्र (2-8) काणे हिस्ट्री आफ धर्मसूत्र (1) पृष्ठ 229
आपस्तंभ धर्म सूत्र 128-31 में उल्लेख है कि 16 से 24 वर्ष की आयु के बीच ब्रह्मचर्य का पालन
करना चाहिए। जो तीन वेदों का अध्ययन करना चाहते हैं और जिनका उपनयन संस्कार हो गया है ये
भिक्षांटन आदि का आचरण करें। जब उसका उपनयन हो जाए तो एक वर्ष तक प्रतिदिन स्नान (संभव
हो तो तीन बार) करें तब उसे वेद पढ़ाया जाए। यह एक सरल प्रायश्चित है। परंतु दूसरों ने कठोर
प्रायश्चित का विधान किया है। वास.ध.सू. 76-79 और वैक स्मृतं 11.3 में कहा गया है कि जो पतित
सावित्रिक हैं उन्हें उद्दालक व्रत धारण करना चाहिए अथवा किसी अश्वमेघ यज्ञ के होत्री के साथ स्नान
करना चाहिए या व्रत्यतोम यज्ञ करे। देखें काणे हि. धर्मसूत्र पृ. 377
- आपस्तंभ धर्म सूत्र 1.1.32-24 में प्रायश्चित का विधान है कि प्रत्येक पीढ़ी के लिए एक वर्ष तक
ब्रह्मचर्य धर्म का पालन किया जाए (जिनका उपनयन नहीं हुआ है)। जिनका उपनयन हो गया हो तो
एक वर्ष तक कुछ मंत्रों का पाठ करने प्रतिदिन (संभव हो तो तीन बार) स्नान किया जाए। वे मंत्र हैं
सात पवमनी मंत्र यद अंति यच्च दरके (ऋग्वेद 9.67.21-27) इसके साथ ही यजुस पवित्र (तैत्तिरीय
संहिता 1.2-1-1 आश्क 17-10) और समापव्रत तथा अंगिरस रचित मंत्र (यजुर्वेद 40.5) का पाठ करे
या व्याहृत के साथ अर्ध्य चढ़ाए। इस सबके पश्चायात वह वेद पढ़ सकता है। काणे हिस्ट्री आफ धर्म
सूत्र पृष्ठ 378