अध्याय 10. शूद्रों का पतन - Page 160

शूद्रों का पतन

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ब्रह्मध्न (जिस के पितामह और पिता का उपनयन न हुआ हो) भी प्रायश्चित करने पर उपनयन करा सकता था। नियमानुसार यदि ख्3, किसी का पिता तथा पितामह का उपनयन न हुआ हो तो उन तीनों पीढि़यों को ब्रह्म हत्यारे कहते थे। उन के घर कोई भोज ग्रहण नहीं करता था। फिर उनके चाहने पर तथा विधिपूर्वक प्रायश्चित करने पर उनका उपनयन हो जाता था।

इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति के वंश में पितामह के समय से उपनयन नहीं हुआ ख्1, हो तो वह 12 वर्ष तक ब्रह्मचारी जीवन व्यतीत कर उपनयन करा सकता था। यद्यपि वह वेदाध्ययन से वंचित रह जाता था, किन्तु उनका पुत्र ‘‘पतित-सावित्रिक’’ की भांति उपनयन संस्कार करा कर आर्य जैसा बन सकता था।

व्रात्यों का भी उपनयन होता था। व्रात्य आर्य थे या अनार्य यह कहना अत्यंत कठिन है। वे पतित जीवन व्यतीत करते थे। वे न तो ब्रह्मचर्य का पालन करते थे और न कृषि करते थे। उनका कोई अपना व्यापार भी नहीं था फिर भी इस पर कोई विवाद नहीं है कि वे आर्य और अनार्य दोनों ही थे। यह भी सत्य है, कि ब्राह्मण उन्हें आर्यों में सम्मिलित करना चाहते थे। व्रात्यस्तोम करने पर उनका उपनयन हो सकता था। प्रात्यस्तोम चार प्रकार का होता था (1) सभी व्रात्यों के लिए (2) अभिशप्तों के लिए जिन्होंने घृणित पाप किए हैं और ब्राह्म जीवन यापन करने के लिए दंडित किए गए। (3) व्रात्य जीवन व्यतीत करने वाले कम आयु वालों के लिए तथा (4) व्रात्य जीवन यापन करने वाले वृद्धों के लिए। चारों व्रात्यस्तोमों में सोदास्तोम ख्2, सब को करना पड़ता था जिससे उन्हें उच्चस्थिति प्राप्त होती थी। व्रात्यस्तोम यज्ञ के उपरांत उनका व्रात्यजीवन समाप्त हुआ समझा जाता था और आर्यों से उनके सामाजिक संबंध स्थापित हो सकते थे। उपनयन से उन्हें वेदाध्ययन का अधिकार भी मिल जाता था।

व्रात्यत्व शुद्धि संग्रह ख्3, में नियत प्रायश्चित के बाद बारह पीढ़ी के उपरांत भी उसे शुद्धिकरण का प्रावधान है।

बोधायन (2.10) ने तो एक वृक्ष विशेष (अस्वथ्था पेड़) के उपनयन तक की बात कही है। इससे उपनयन के प्रचलन की व्यापकता का पता चलता है।

इस परिप्रेक्ष्य में विश्वास कर लेना कठिन है कि क्या आर्यों ने प्रारंभ से ही शूद्रों और स्त्रियों को उपनयन से वंचित कर रखा था? इस संदर्भ में भारतीय ईरानियों का उदाहरण देना युक्ति संगत होगा, जिनके साथ भारतीय आर्यों से सांस्कृतिक और धार्मिक आचार

  1. आपस्तंभ धर्म सूत्र 1-1-2-5-10

  2. काणे (वही पृष्ठ 385) के अनुसार एक कथा है कि जब देवगण स्वर्ग गए तो व्रात्य जीवन बिताने

वालों को रोक दिया गया और सोदास्तोम के बाद ही जा सके। (तांडप ब्राह्मणः 17-1-1) 3. काणे आध्यात्मक धर्म सूत्र पृष्ठ 387