अध्याय 10. शूद्रों का पतन - Page 161

146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

पर निकटस्थ संबंध थे। ईरानियां में सभी वर्ग के स्त्री पुरुष यज्ञोपवीत धारण करते थे। फिर आलोचक जवाब दें कि भारतीय आर्यों में इस भेद का कारण क्या है?

हमें परिस्थिति व अन्य साक्ष्यों पर निर्भर करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद हैं कि आर्यों में भी स्त्रियों और शूद्रों को उपनयन का अधिकार था। हिंदू धर्म शास्त्र ख्1, के अनुसार स्त्रियों का उपनयन होता था। वे न केवल वेद पाठ करती थीं, अपितु वेदाध्ययन हेतु पाठशालाएं भी चलती थीं। यही कारण है कि स्त्री पूर्व मीमांसा पर भाष्य लिखे गए हैं।

जहां तक शूद्रों का प्रश्न है, इस पर भी अनुकूल प्रमाण है। राजा सुदास का राज्याभिषेक ऋषि वशिष्ठ ने किया था। उसने राजसूय यज्ञ किया था। सुदास शूद्र था। यह यज्ञोपवीत धारण करता होगा, क्योंकि उपनयन के उपरांत ही वह इन संस्कारों का अधिकारी बन सकता था। यह स्पष्ट है कि शूद्र भी उपनयन के अधिकारी थे। मैक्समूलर द्वारा उद्धत संस्कार गणपति में शूद्र उपनयन के अधिकारी है। ख्2,

स्त्रियों और शूद्रों के मामले में केवल एक भिन्नता है। स्त्रियों का उपनयन बंद किए जाने के बारे में एक तर्कसंगत व्याख्या है। परंतु शूद्रों के विषय में कोई स्पष्टीकरण नहीं है। यह तर्क दिया गया है कि स्त्रियों का उपनयन आठ साल की आयु तक होता था और विवाह की आयु इसके बाद होती थी परंतु कालांतर में विवाह की आयु घटते-घटते आठ साल हो गई तो उपनयन संस्कार स्वतंत्र रूप से न होकर विवाह संस्कार में मिल गया और धीरे-धीरे समाप्त हो गया। यह सत्य है या असत्य, यह दूसरी बात है कि किंतु शूद्रों का उपनयन होता था। स्पष्टीकरण सही हो या गलत, यह अलग सवाल है। शूद्रों का उपनयन कैसे बंद हुआ इस संबंध में कोई स्पष्ट सिद्धांत उपलब्ध नहीं है।

जो लोग मेरे तर्कों के बावजूद अपनी आपत्ति पर डटे रहते हैं उन्हें कमजोरी का अहसास करना होगा। प्रश्न है शूद्रों को अधिकार क्यों नही है? पोंगापंथी यही कहेंगे कि आरंभ से ही उपनयन शूद्रों के लिए है ही नहीं। किन्तु वे इसका कोई कारण या आधार नहीं बताते। उनका कहना केवल यही होता है कि शूद्र अनार्य होने के कारण उपनयन के अधिकारी नहीं है। चूंकि यह सिद्ध किया जा चुका है कि शूद्र अनार्य नहीं आर्य हैं, इसलिए यह तर्क निराधार है। अब प्रश्न यह है कि शूद्रों को प्रारंभ से ही उपनयन का अधिकार न होने की बात तार्किक तथा प्रामाणिकता के आधार पर वेद विधान के प्रतिकूल है तो अमान्य है। अब हम इस बात पर विचार करेंगे कि शूद्रों को उपनयन का अधिकार था जो बाद में छीन लिया गया। यह अधिकार क्यों और कैसे छीना गया, इस पर विचार बाद में करेंगे।

  1. पुरुषार्थ, सितम्बर, 1940 का अंक

  2. हिस्ट्री आफ ऐंशेंट संस्कृत लिटरेचर (1860) पृष्ठ 207