शूद्रों का पतन
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VI
तीसरी आपत्ति तो व्यर्थ की है। ऐसी आपत्ति वही कर सकता है जिसे उपनयन संस्कार का ज्ञान ही नहीं है।
आर्य अपने अनुष्ठानों को संस्कार कहते थे। गौतम धर्म सूत्र (8.14-24) में निम्नलिखित 40 संस्कारों का वर्णन हैःµ
गर्भाधान पुंसवन, सीमान्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, कौल, उपनयन, चार वेद व्रत, स्नान या संवर्तन, विवाह, पांच दैनिक महायज्ञ (देव, पितृ, मनुष्य, भूत और ब्रह्म के लिए) सात पाकयज्ञ (अस्तक, पर्वनास्थालियाकस्थ, श्राद्ध, श्रावणी, अग्रहायणी, चैत्री, अस्वयुजी) सात हविर्यज्ञ (अग्नियाध्येय, अग्निकोत्र, दशपूर्णमास, अग्रायण, चातुर्मास, निरूद्धपासुबंध तथा सौत्रु मणि) सात सोमयज्ञ (अग्निस्तोम, अत्याग्निस्तोम, उक्त्थ्य, सुदासिन, वाजयेय, अतिरत्र और अप्तोय)।
बाद में संस्कारों और संकीर्ण भावनाओं में अंतर आ गया। यथार्थ में संस्कार यज्ञ का नाम था। उसे सही अर्थों में नहीं लिखा गया और ये बाद में घटकर सोलह रह गए।
संस्कारों के संबंध में कोई विस्मय नहीं है। प्रत्येक समाज संस्कारों को स्वीकार करता है। ईसाइयों में भी बपतिस्म, कन्फरमेशन, मेट्रोमेनी, एक्ट्रीम अंकशण, यूकेरिस्ट आदि होते हैं। ये सामाजिक न होकर धार्मिक होते हैं। प्रारंभ में भारतीय आर्यों और ईसाइयों के संस्कार भिन्न होते हैं। ईसाई मान्यताओं के अनुसार उनके संस्कार विशुद्ध धार्मिक होते थे जो ईश्वर की कृपाकांक्षा के अनुष्ठान हैं। पूर्व मीमांसा के रचनाकार जैमिनी के मतानुसार संस्कारों के दो रूप होते हैं। उनसे दुष्कर्मों का क्षय और सदगुणों का उदय होता है। उपनयन अन्य संस्कारों की भांति धार्मिक था। शूद्रों का उपनयन बंद कर देने से इसके महत्व में अभूतपूर्व परितर्वन आया जो सामाजिक महत्व का विषय बन गया।
आर्य अथवा अनार्य सभी उपनयन के पात्र थे। उनके लिए सामाजिक महत्व का कोई स्थान नहीं था। यह सभी के लिए समान संस्कार था। यह मुट्ठी भर लोगों का विशेषाधिकार नहीं था। जब शूद्र इससे वंचित कर दिए गए तो यह प्रतिष्ठा का चिह्न बन गया और इसका वर्जन दासत्व की निशानी बन गया। शूद्रों को उपनयन से वंचित करने से आर्य समुदाय में एक नया अध्याय जुड़ गया। इससे शूद्र अपने से ऊपर वाले वर्णों को श्रेष्ठ समझने लगे और उच्च वर्ग शूद्रों को हीन मानने लगा। शूद्रों के पतन में यज्ञोपवीत की अधिकारहीनता एक सूत्र था।
उपनयन के बारे में कुछ और भी बातें हैं। ख्1, पूर्व मीमांसा के अवलोकन से पता चलता
गंगानाथ झा - पूर्व मीमांसा पृष्ठ 368-369 और 171-172
झा इस बात को कोई नहीं समझ पाता कि मनु ने स्त्री और शूद्रों को संपत्ति और वेद पाठ के अधिकार
से क्यों वंचित किया। यदि यह बात समझ में आ जाए कि वे प्रतिबंध उसी नियम का स्वाभाविक
प्रतिफल है कि शूद्र और स्त्री यज्ञ करने के अधिकारी नहीं है।