148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
है कि इसमें जो नियम निर्धारित किए गए, कि किसी व्यक्ति को कोई भी संपत्ति उपलब्ध कराने का अर्थ है कि वह उसका उपयोग यज्ञ के लिए करेगा। दूसरे शब्दों में जो व्यकित यज्ञ नहीं करा सकता उसे संपत्ति का अधिकार नहीं है। यज्ञ कराने की पात्रता उपनयन ख्2, संस्कार है। इसका अर्थ यह हुआ कि संपत्ति के स्वामी वही हो सकते हैं जो उपनयन के पात्र हैं।
पूर्व मीमांसा का दूसरा नियम है कि यज्ञ तभी संपन्न हो सकता है जब वेद मंत्रों का पाठ किया जाए। इसका अर्थ यह हुआ कि यज्ञकर्ता वेदपाठी हो। यदि किसी व्यक्ति ने वेदाध्ययन नहीं किया है तो वह यज्ञ नहीं कर सकता। वेदों का अध्ययन मात्र वहीं कर सकते हैं जिनका उपनयन संस्कार हुआ हो। दूसरे शब्दों में ज्ञान और अध्ययन की पात्रता वेदों का अध्ययन उपनयन के माध्यम से ही संभव है। यदि उपनयम न हो तो ज्ञान का मार्ग अवरुद्ध हैं उपनयन मात्र एक संस्कार ही नहीं है। यह संपत्ति और ज्ञानार्जन दोनों का महत्वपूर्ण अधिकार है।
जिन्हें इस बात का अहसास नहीं है कि उपनयन की अनिवार्यता से शूद्रों की सामाजिक प्रतिष्ठा को कितना आघात पहुंचता है उन्हें यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी कि पूर्व मीमांसा में क्या विधान है। जब उपनयन का संबंध शिक्षा और संपत्ति से जोड़ दिया जाए तो उन्हें यह समझने में देर नहीं लगेगी कि शूद्रों के पतन का एक मात्र कारण यही है कि उन्हें उपनयन से वंचित कर दिया गया।
उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि प्राचीन आर्यों में उपनयन का कितना महत्व था। उपनयन से व्यक्ति को सामाजिक प्रतिष्ठा और वैयक्तिक अधिकार प्राप्त होते थे। ब्राह्मणों ने शूद्रों से उपनयन का अधिकार छीन कर उन्हें ज्ञानार्जन और संपत्ति संचय से वंचित कर दिया। उसका सामाजिक पतन हो गया। वह दरिद्र और अज्ञानी हो गए। शूद्रों से बदला लेने के लिए ब्राह्मणों ने शूद्रों के विरुद्ध उपनयन विरोध को एक भीषण अणुबम के रूप में प्रयोग कर उन्हें गर्त में ढकेल दिया और उन्हें शमशान तुल्य बना डाला।
VII
यह निर्विवाद है कि ब्राह्मण निस्संदेह दूसरों को उपनयन से वंचित करने की शक्ति रखते हैं। यद्यपि इस संबंध में कोई लिखित आदेश नहीं है, तथापि दो तथ्य ध्यान में रखने से शंका का समाधान हो जाएगा। जो आर्य समुदाय के हथकंडों से परिचित नहीं हैं उनके मन मानस में दो बातें सदा घर किए बैठी रहेंगी। (1) उपनयन केवल ब्राह्मण ही करा सकता है तथा (2) अनाधिकृत उपनयन कराने वाला दंड का भागी होगा।
शायद बहुत प्राचीन काल में पिता ही पुत्र को गायत्री पाठ कराता था और वेदाध्ययन गायत्री से प्रारंभ होता था। वेदाध्ययन उपनयन के पश्चात होने लगा। परंतु यह निश्चित