शूद्रों का पतन
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है कि बहुत पहले से ही उपनयन गुरु कराता था। उपनयन के उपरांत बालक आचार्य के घर पर ही रह कर वेदाध्ययन करता था।
‘‘आचार्य कौन हो सकता है और उसकी योग्यता क्या हो? यह प्रश्न पुरातन काल से ही विवाद का विषय रहा है। आचार्य वेद-विद हो। एक ब्राह्मण ग्रंथ ख्1, में कहा गया है_ ‘‘जिस आचार्य को शिक्षा से वंचित कर दिया गया है वह नरक में जाता है जो अशिक्षित है नरकगामी है। आचार्य वही हो सकता है जो वेद पारंगत हो।
आपस्तंभ धर्म सूत्र (1.1.1.12.13) के अनुसार उपनयन वह आचार्य कराए जो विद्वान हो। उसकी योग्यताएं हैं जो वंश परंपरा से विद्वान हो, जो शांत मस्तिष्क हो। ऐसे आचार्य से वेद पाठ ब्रह्मचर्य पर्यंत अथवा तब तक कराना चाहिए जब तक कि वह धर्मच्युत ख्2, न हो जाए।
आचार्य की पहली योग्यता है वह ब्राह्मण होना चाहिए। ब्राह्मण आचार्य न मिलने पर क्षत्रिय या वैश्य ख्3, गुरू धारण करना चाहिए। यह अपवाद तब प्रचलित था जब वेदाध्ययन और अध्यापक के अधिकार नियत नहीं किए गए थे परंतु यह भेद तब किया गया - और यह भेद बहुत पहले कर दिया गया था - जबकि वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच कशमकश चल रही थी। तब आचार्य पद ब्राह्मण के लिए आरक्षित कर दिया गया। वही उपनयन भी करा सकता था। यह व्यवस्था पक्की हो गई थी कि केवल ब्राह्मण ही उपनयन कराएगा। कोई अन्य उपनयन कराएगा तो वैध नहीं होगा।
ब्राह्मणों को यह भी आदेश था कि वह समाज विरोधी अर्थात ब्राह्मण द्वारा अस्वीकृत धार्मिक कृत्य संपन्न न कराएं। ऐसा करने वाला ब्राह्मण दंड का भागी होता था। इस संबंध में प्राचीन संहिताओं में अनेक प्रकार के दंडों का प्रावधान मिलता है। पुराने में ऐसी अनेक व्यवस्थाएं हैं। मैं केवल मनु और पराशर की कृतियों के प्रसंग प्रस्तुत कर रहा हूंः -
मनुस्मृति (3-150) में बताया गया है कि किस श्रेणी का ब्राह्मण यज्ञ हवन करने कराने का पात्र नहीं है। नीचे सूची में उनके नाम दिए गए हैं।
मनुस्मृति (3-156) ‘‘वे ब्राह्मण जो हवन का कव्य नहीं ले सकते मैं उन्हें बताता हूं। जो शुल्क लेकर पढ़ाएं और जो शुल्क देकर पढ़ें, जो शूद्र विद्यार्थी को पढ़ाएं और
- आपस्तम्भ धर्म सूत्र 1.1.1.11, काणे -2 (1) पृष्ठ 324
2 आचार्य वेद-विज्ञ धर्मविद कुलीन पवित्र और श्रोत्रिय हो और आलसी न हो।
- यह ध्यान देने योग्य है कि ब्राह्मण शिष्य ब्राह्मण आचार्य की ही सेवा कर सकता था, क्षत्रिय या वैश्य
गुरु का तो केवल अनुसरण ही करता था। वह न तो उसके शरीर की मालिश कर सकता था और न
ही पैर धो सकता था। आपस्तंभ धर्म सूत्र 2-24-25-28, गौत-1,1-3, बौधायन धर्म सूत्र 1-2-40-42,
तभी वेध वेदाध्ययन करा सकता जबकि ब्राह्मण उससे अनुरोध करे।