150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
जिसका गुरु शूद्र हो, जो कटुभाषी हो, जो कुल्टा या विधवा का पुत्र हो।’’
पराशर ख्1, ने कहा हैः - वह ब्राह्मण जो दक्षिणा (शुल्क) के लिए शूद्र का यज्ञ कराता है, शूद्र हो जाता है और यज्ञ करने वाला शूद्र ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर लेता है।’’ माधव के अनुसार ‘यज्ञ’ का पुण्य शूद्र को मिलता है और ब्राह्मण पाप का भागी बनता है।’’
जो लोग यह प्रश्न करते हैं कि ब्राह्मणों को क्या अधिकार था कि वे शूद्रों को उपनयन से वंचित कर दें। उन्हें ये दो तथ्य समझने चाहिएं। (1) उपनयन केवल ब्राह्मण ही करा सकता था तथा (2) अनधिकृत ब्राह्मणों द्वारा अमान्य उपनयन कराने वाला ब्राह्मण दंड का भागी होता था। उपरोक्त दो कारणों से ब्राह्मणों को निस्संदेह यह अधिकार मिल गया कि वे जिसका चाहें उपनयन करें जिनका न चाहें न करें। यह तथ्य है कि ये दोनों ही अधिकार ब्राह्मण की मुट्ठी में थे। ऐसा साफ नहीं लिखा गया है परंतु इसका प्रछन्न आशय यही था। ब्राह्मणों को अपनी इस ताकत का पता था। इसमें संदेह नहीं। उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार सोलह उदाहरण सुलभ हैं जिनमें ब्राह्मणों ने विभिन्न जातियों को उपनयन से वंचित करने की चेतावनी दी। इनमें नौ मामलों में कायस्थलों को, चार में पांचालों को और एक में पालशे को चेतावनी दी गई। इतना ही नहीं सन् 556 से 1904 ई. तक इन्होंने मराठा राजाओं को भी चुनौती दी। यह महत्व पूर्ण बात है कि उन्होंने दो मराठा राजाओं को चेतावनी दी। ये घटनाएं 556 और 1904 ई. में हुई। यह ठीक है कि ये उदाहरण यद्यपि अति प्राचीन नहीं हैं फिर भी इन्हें उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा, जिनमेंं ब्राह्मणों ने उपनयन न कराने के अपने विशेषाधिकार का प्रयोग किया। यह अधिकार अति प्राचीन काल को मिला होगा। इसके प्रमाण हैं। पुरातन काल में सत्यकाम जाबाली ने कहा था कि मनुष्य का वर्ण उसके गुणों, मानसिक एवं चारित्रिक व्यवहार से जाना जाता है। उसके जन्म से नहीं। जाबाली के संदर्भ में जहां यह सत्य है वहीं यह भी सत्य है कि ब्राह्मणों को उपनयन कराने तथा न कराने का अधिकार बहुत पहले ही मिल चुका था।
ऐसे उदाहरणों की गणना का कोई महत्व नहीं है जब तक कि हमें उनमें उपनयन न कराने में प्रमाण न मिल जाएं। ऐसा करने के लिए हमें प्रत्येक का विवरण जानना होगा। दुर्भाग्य से उपरोक्त उदाहरणों के संबंधा में पूर्ण विवरण नहीं मिले। केवल कुछ निर्णय ही सुलभ हैं। अतः वे हमारे काम के नहीं हैं। केवल ‘‘ब्राह्मण बनाम शिवाजी’’ का विस्तृत एवं पूर्ण विवरण उपलब्ध है। यह विशेष महत्वपूर्ण वाला मामला है अतः इसका सविस्तार विवेचन करेंगे। इसके तथ्य रोचक और शिक्षाप्रद हैं और विचाराधीन विषय पर भी यथेष्ट डालते हैं।
- व्यास कृत व्यवहार मयूख खंड (काणे द्वारा संपादित)