शूद्रों का पतन
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VIII
यह सर्वविदित है कि शिवाजी ने पश्चिम महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिंदू राज्य की स्थापना करने के उपरांत सिंहासनारूढ़ होने हेतु अपने राज्यभिषेक का इरादा किया। शिवाजी और उनके मित्रों की इच्छा थी कि अभिषेक वैदिक रीति से हो, लेकिन इसमें बाधाएं थीं। प्रथम तो यह कि वैदिक रीति से अभिषेक ब्राह्मणों की इच्छा पर ही निर्भर करता था। ब्राह्मण के सिवाय कोई इसे संपन्न नहीं करा सकता था। दूसरी कठिनाई यह थी कि जब तक शिवाजी अपने को क्षत्रिय सिद्ध न कर दें, राज्याभिषेक असंभव था। तीसरी बाधा यह थी कि उपनयन न हो पाने के कारण राज्याभिषेक नहीं हो सकता था। तीसरी बाधा इतनी बड़ी नहीं थी क्योंकि वृत्यस्तोम कराया जा सकता था। पहली कठिनाई शिवाजी के लिए चट्टान जैसी थी। यह थी शिवाजी की सामाजिक स्थिति का प्रश्न कि क्या वे क्षत्रिय थे? मुख्य विरोधी उनका प्रधानमंत्री मोरोपंत पिंगले था। दुर्भाग्य से शिवाजी के सरदारों ने भी उन्हें सामाजिक मान्यता ख्1, नहीं दी और उसके खिलाफ एक जुट हो गए। क्योंकि उनके अनुसार शिवाजी शूद्र थे। ब्राह्मणों का मत था कि क्षत्रिय कलियुग में ही नहीं हैं, स्पष्ट रूप से वे क्षत्रिय बन भी नहीं सके थे क्योंकि वे कलियुग में ही रह रहे थे। उनके अनुसार शिवाजी शूद्र थे। ब्राह्मणों का मत था कि कलियुग में क्षत्रिय रहे ही नहीं। इस मत को क्षत्रियों के लिए निर्धारित ग्यारह वर्ष की आयु में शिवाजी का उपनयन न होने से और अधिक बल मिला और वे शूद्र ठहराए गए। विद्वान गाघभट्ट ने सभी कठिनाइयां दूर कर और व्रत्यस्तोम उपनयन संस्कार कराने के बाद 6 जून, 1674 को रायगढ़ मे शिवाजी का राज्याभिषेक कर दिया ख्2, ।
- ‘‘हालांकि दक्षिण के उच्च विचारों वाले सामंतों ने शिवाजी को प्रसन्नतापूर्वक मान्यता दे दी थी। फिर
भी वे व्यक्तिगत रूप से इसे सामान्य व्यवहार नहीं बनाना चाहते थे और शाही दावतों में वे इस बात पर
एतराज करते थे कि उस आसन पर एक भोसले बैठे, जिस पर कभी मोहिते और निम्बालकर सावंत और
घोरपड़े बैठते थे। उन्होंने इस विषय में अपने अमात्य बालाजी अयाजी चिटनिस से विचार कियां उन्होंने
कहा कि वे अपनी पदवी पर मुगल सम्राट के बजाए बनारस के पंडितों से मोहर लगवाएं। महाराज ने
अपनी माता जीजाबाई संत समर्थ गुरू रामदास और अपनी आराध्य देवी भवानी से आज्ञा ली। वे सभी
अमात्य के सुझाव पर सहमत थे’’ (हिस्ट्री आफ महाराष्ट्र पृ. 224) वैदिक रीति से राजतिलक कराने
के पीछे विचार यह लगता है कि वैधानिक और राजनीतिक सत्ता के स्थान पर सामाजिक परंपराओं को
अपनाया जाए।
- इससे ऐसा लगता है कि ब्राह्मण उनका राज्याभिषेक कराने को तैयार थे परंतु वैदिक रीति से नहीं। वे
पौराणिक रीति से करना चाहते थे जैसा कि शूद्रों का किया जाता था। उन्होंने भविष्यवाणी की कि यदि
वैदिक रीति अपनाई गई तो अपशकुन होंगे। दुर्भाग्य से वे अपशकुन हुए भी। अंधविश्वास से डर कर
उन्होंने दुबारा गैर वैदिक रीति से राज्याभिषेक कराया। दूसरे राज्याभिषेक के बारे में सी.वी. वैद्य ने रोचक
जानकारी दी हैः-
वितंडावादी और क्षुब्ध ब्राह्मण पूर्ववत मौजूद थे। उन्होंने ठीक ढंग से अनुष्ठान नहीं किया, हालांकि पूरे
महाराष्ट्र में उसे स्वीकार कर लिया गया। राज्याभिषेक कल्पतरू नाम से एक काव्य कविता रची गई।
उसकी प्रति बंगाल की रायल एशियाटिक सोसायटी में उपलब्ध है। उसी से लेकर पुणे के इतिहास मंडल
ने उसे प्रकाशित किया है (त्रैमासिक खंड 10-1) उसमें कुछ आपत्तियों का उल्लेख है जो राज्याभिषेक
..... पृष्ठ 142 पर जारी