152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
शिवाजी का प्रसंग अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यह इस कारण महत्वपूर्ण है इससे यह प्रमाणित है कि (1) उपनयन कराने का अधिकार केवल ब्राह्मण को है तथा उसे कोई अन्य ऐसा करने को बाध्य नहीं कर सकता। शिवाजी एक स्वतंत्र राज्य के शासक थे और स्वयं महाराजा तथा छत्रपति कहलाते थे। अनेक ब्राह्मण उनकी प्रजा थे और फिर भी वे उन्हें अपने राज्याभिषेक के लिए बाध्य नहीं कर सकते थे।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि शिवाजी यह भलीभांति जानते थे कि ब्राह्मणों द्वारा किया गया संस्कार ही समाज में मान्य है। अतः उन्हें यह साहस ख्1, न हुआ कि किसी अब्राह्मण से संस्कार कराते। यदि कराते भी तो उसका कोई सामाजिक या आध्यात्मिक महत्व न होता।
तीसरी बात यह है कि यह महत्वपूर्ण है कि किसी हिंदू का वर्ण निर्धारित करने का अधिकार केवल ब्राह्मण को था। शिवाजी को क्षत्रिय सिद्ध करने के लिए उनके परम मित्र बालाजी अंबाजी मेवाड़ से एक वंशावली लाए जिसमें शिवाजी का संबंध मेवाड़ के सिसोदिया वंश से सिद्ध किया था। यह कहा जाता है कि यह वंशावली जाली थी और मात्र राज्याभिषेक के अवसर के लिए बनवाई गई थी। यदि जन्मपत्री को सत्य भी मान
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से संबद्ध हैं। यह कविता समसामयिक नहीं थी क्योंकि उनमें परवर्ती विचार मौजूद हैं कि शिवाजी शिव
के अवतार थे। विष्णु के नहीं जैसा कि पूर्ववर्ती शैव भारत में हैं। हालांकि वह राजा राम का काल
था। इसमें बनारस से तापस निश्चल पुरी के जो गांघभट्ट के विरोधी थे और कोंकण के गोविंदभट्ट
का काल्पनिक संवाद समाहित है। इससें राज्याभिषेक के पूर्व और पश्चात के अपशकुनों का वर्णन है।
जैसे कि प्रताप राव गुज्जर और शिवाजी की पत्नी काशी बाई का देहांत आदि और स्वयं की नाक पर
चोट लगाना। कविता में विशेष रूप से कहा गया है कि गांघभट्ट ने उन्हीं ब्राह्मणों को अपना सहयोगी
बनाया था जो उसके अनुयायी थे और निश्चलपुरी के सहयोगियों को नहीं रखा था। फिर समारोह में
की गई त्रुटियों का भी उल्लेख है। इस प्रकार शिवाजी सिंहासनारूढ़ होने से पूर्व जब रथ पर बैठे तो
उससे पूर्व गांघभट्ट चढ़ बैठे। यह सब तमाशा देखकर निश्चलपुरी ने किला त्याग दिया और शिवाजी
को बताया कि 13वें और 22वें दिन अनिष्ठा होगी। 13वें दिन शिवाजी की माता का परलोक वास हो
गया। फिर प्रताप गढ़ की अश्वशाला में आग लग गई और अनेक घोड़े जल गए। तथा सिंह गढ़ में एक
हाथी मर गया। इन घटनाओं के बाद शिवाजी ने फिर निश्चलपुरी को बुलाया और उनके सहयोगियों से
सिंहासनरूढ़ होने के लिए दुबारा राजतिलक कराया। वह वैदिक रीति से न करा कर तांत्रिक रीति से
हुआ। इस घटना का भी विस्तार से वर्णन है। इसमें सामवेद से कुछ वैदिक मंत्र पढ़े गए किन्तु अनुष्ठान
वैदिक नहीं था। यह अश्विन शुदी पंचमी (ललित पंचमी 1596) को संपन्न हुआ। जैसा कि कविता के
अंत में कहा गया है। इसका उल्लेख निश्चलपुरी ने भी किया है और मुश्लिल अभिलेख में भी इसका
वर्णन है। (शिवाजी द फाउंडर आफ मराठा स्वराज्य पृष्ठ 252-253)।
- ब्राह्मणों द्वारा कायस्थों की स्थिति को बार-बार चुनौतियां दिए जाने के विरूद्ध कायस्थों ने पुरोहित बन
कर अपने रीति रिवाजों के धार्मिक अनुष्ठान स्वयं करने का निर्णय लिया। परंतु वे इसे कार्य रूप नहीं
दे सके। कारण वही एक है।
- मेवाड़ का सिसोदिया वंश दो कारणों से महत्वपूर्ण है। (1) वे उदयपुर के सिसोदियाओं की शाखा हैं
जो राम के ज्येष्ठ पुत्र लव के वंशज थे (2) मेवाड़ के सिसोदिया कुलीन थे क्योंकि उन्होंने मुगलों को
अपनी बेटियां नहीं ब्याही और न ही उन राजपूत वंशों से विवाह संबंध रखे जिन्होंने ऐसा किया था जैसे
जयपुर और जोधपुर के राजाओं ने। क्या यही कारण था कि शिवाजी को मेवाड़ के सिसोदिया वंश से
जोड़ने का प्रयत्न किया गया?